मैं काकेश नहीं हूँ ..काश इतना अच्छा लिख पाता.....
और देखिये....
लाई की सब्जी, आलू मेथी की सब्जी, गडेरी की भांग डाली हुई सब्जी,घौत की दाल तो जाड़ों में ही भल (अच्छी) लगने वाली हुई.ब्याव (शाम) होते ही सब लोग अंगीठी जला लेने वाले हुए.घर के बुड़-बाड़नियों के लिये सगड़ में गुपटाले लगा के कोयले के चूरे के लड्डू सिलका देना हुआ.वो आराम से हाथ तापने वाले हुए.
क्या करें भुला अब तो घर में सब कुछ है…हीटर है ,गीजर है सब तरह की सुविधायें हैं फिर भी मन करता है कि जैसे भाग के चले जायें अपने उसी पटाल वाले आंगन में और धूप सेंकने लगें.कोई दही मूली वाला नीबू सान के लाये और उसे चट चट करते हुए खायें.जंबू का धुंगार लगाये हुए भट के डुबके हों, दाणिम की चटनी हो….भांगे का नमक हो…क्या क्या सोचूँ ..क्या क्या इच्छा करूँ …पूरी थोड़े होनी है रे अब इस उमर में
http://kakesh.com/?p=205abhee abhee pata chala....
अभी हिन्दी ब्लॉगिंग में सर्वश्रेष्ठ चिट्ठाकार को चुना जा रहा है. यह चुनाव
http://www.tarakash.com/poll/ पर किया जा रहा है. मैदान में दो उत्तराखंडी चिट्ठाकार भी हैं.
पुरुष वर्ग में : काकेश
महिला वर्ग में : घुघुती बासुती
मेरा आपसे निवेदन है कि
http://www.tarakash.com/poll/ पर जाकर कृपया इन दोनों चिठ्ठों पर अपना मत दें.