लिंगवाल जी ये जरूरी नही है कि जब मेरे पास किसी टोपिक का सॉल्यूशन हो तभी में उस पर चर्चा करूँ. अगर यदि मेरे पास सॉल्यूशन ही होता तो मुझे चर्चा करने की जरूरत ही नही पड़ती, मैं इसलिए यहाँ चर्चा करता हूँ कि आप जैसे बुद्धिमान लोगों के अच्छे अच्छे सुझाव मिलें, और हमेशा ये जरूरी नही कि प्रतिक्रिया में आपको हमेशा अच्छे ही सुझाव मिलें, किसी से आप इत्तेफाक रखते है और किसी से नही भी.
जहा तक बात इस टोपिक की है तो ये आप और हम लोगों के बीच की है. आपने ठीक कहा है कि हमारे देश में ऐसे लोगों और सामाजिक संस्थाओं की कमी नही है जो ऐसे लोगों की सेवा में जुटी रहती है और सेवा भी करती है, लेकिन दूसरी तरफ़ की सच्चाई को भी हम झुठला नही सकते. एक कुत्ता टी वी विज्ञापन में काम करता है तो उस कुत्ते के फेवर में कई पशु प्रेमी संस्थाएं आगे निकल आती है, केवल इस बात का मुद्दा रख के कि विज्ञापन फिल्माकन के समय उस कुत्ते पर जुल्म किया गया होगा, उसको परेशां किया गया होगा, लगान फ़िल्म को बने हुए ३-४ साल हो जाते है, तब ऐसी पशु प्रेमी संस्थाओं को होश आता है कि फ़िल्म में हिरन पर अत्याचार किया गया है,उसको परेशान किया गया है, तब ये संस्थाएं कानून का सहारा तक लेना नही भूलती. जो कुत्ता शाही भोजन करता है, शाही माहोल में रहता है, जिसमे कि आप और हम जैसे सामान्य परिवार के लोग कभी भी कल्पना नही कर सकते, उस कुत्ते की फिक्र तो इन सेवी संस्थाओं को खूब लगी रहती है, लेकिन दूसरी ओर वे भूल जाते है कि ऐसे ही हजारों पशु (कुत्ते, गाय) आज भी बड़े और छोटे शहरों की गलियों में घुमते हुए नजर आते है, वो एक रोटी के टुकड़े को पालने के लिए आपस में लड़ते रहते है और एक दूसरे के खून के प्यासे बन जाता है, गली का गन्दा पानी पीते है, कूड़े कचरे से अपनी भूख शांत करते है, तब उन लोगों का प्रेम कहा जाता है? तब वे लोग उनकी सहायता के लिए क्यों आगे नही आते है? तब कहा जाती है उनकी संस्था?
बात सर्व शिक्षा और बाल शोषण की हो रही है. आज भी आपको कई ऐसे बच्चे मिल जायेंगे, जिनके हाथ में बस्ता-पाटी, कलम होनी चाहिए थी, लेकिन उनके हाथ में कचरे का थैला नजर आता है, जो आप और हमारी गन्दगी साफ़ करते हुए नजर आते है, ऐसा नही है कि इनकी सहायता के लिए भी कोई स्वयं सेवी संस्था नही होगी, संस्था जरूर होगी, उनका काम भी चल रहा होगा, लेकिन कैसा और कहा उनका काम चल रहा है, ये तो या तो केवल उसी संस्था के कर्मचारी जानते होंगे या जो वह रहते है वो लोग जानते होंगे.
लिंगवाल जी अगर मुझे कोई भूखा मिलता है तो मुझे उसे भोजन खिलाने में कोई दिक्कत नही होगी, मैं १ बार खाना खिला सकता हूँ , २ बार खिला सकता हूँ, ३ बार खिला सकता हूँ लेकिन निश्चित ही चोथी बार मेरा मन उससे ऊब जाएगा और हो सकता है कि मैं बाद में उसे खाना खिलाने से भी मना कर दूँ या उससे दूर भागने की कोशिश करूँ.
आप सॉल्यूशन की बात कर रहे है, चलो यदि मैं ये कहता हूँ कि बुजुर्गों के लिए ब्रिधा आश्रम अधिक से अधिक संख्या में खोलने चाहिए ताकि बुजुर्गों को वहा आश्रय मिले, आश्रय तो उनको जरूर मिल सकता है,लेकिन क्या वो वहा पर सच्चे दिल से रह पायेंगे. क्या ब्रिधा आश्रम से उनको वो सारे सुख मिल जायेंगे जो कि उनको बुडापे में अपने बच्चों से मिलने की उम्मीद थी?
लिंगवाल जी यहाँ पर ये टोपिक शुरू करने का मेरा मकसद कोई बड़ी चर्चा करना नही है, केवल ऐसे लोगों को अपनी तरफ़ से एक संदेश देने का प्रयास करना है कि आख़िर हम लोग ऐसा क्यों करते हैं? मैं मानता हूँ कि कभी कभी माता पिता भी ग़लत हो सकते है लेकिन इसका मतलब ये नही कि उनके साथ ऐसा ब्यवहार किया जाय.
अगर आप ये सोचते है कि यदि मेरे पास किसी चीज का सॉल्यूशन नही है तो मुझे उस पर चर्चा नही करनी चाहिए, मैं आपकी इस बात से बिल्कुल भी सहमत नही हूँ, मेरा सोचना रहता है कि अगर मेरे पास नही है तो शायद किसी दूसरे के पास होगा. लेकिन कुछ चीजें ऐसी होती है जिनका सॉल्यूशन केवल अपने घर में होता है, आवश्यकता है उनको उजागर करने की, अमल में लाने की और प्रेरित करने की.