AuthorTopic: Uttarakhandi e-Magazine - उत्तराखंडी ई-पत्रिका  (Read 42672 times)

Offline m_a_n_u

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Jingyasu ji aapka jawab nahin...bahut khub...
सुखी दुखी जखी रोला त्वे ते नि बिसरोला, तेरो मान सम्मान तेरा गीतू गुन्जोला
देसु परदेसा रे , मेरा गढ़ देसा हे........

Offline धनेश कोठारी

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  • मुट्ठियां भींचो मगर, मुट्ठियों में लावा भरकर, मुट्ठियों को तान दो।
जलम्यां कु गर्व

गर्व च हम
यिं धरती मा जल्म्यां
उत्तराखण्डी बच्योंण कु
देवभूमि अर वीर भूमि मा
सच्च का दगड़ा होण कु

आज नयि नि बात पुराणी
संघर्षै कि हमरि कहानी
चौंरा मुंडूं का चिंणी भंडारिन्
ल्वै कि गदन्योन् घट्ट रिगैनी
लोधी रिखोला जीतू पुरिया
कतगि ह्‍वेन पूत-सपूत
ज्यू जानै कि बाजि लगौण कु

गंगा जमुना का मैती छां हम
बदरी-केदार यख हेमकुण्ड धाम
चंद्र सुर कुंजा धारी माता
नन्दा कैलाश लग्यूं च घाम
भैरों नरसिंग अर नागरजा
निरंकार कि संगति च हाम
पांच परयाग हरि हरिद्वार
अपणा पाप बगौण कु

मान सम्मान सेवा सौंळी
प्यार उलार रीत हमरि
धरम ईमान कि स्वाणि सभ्यता
सब्यों रिझौंदी संस्कृति न्यारी
धीर गंभीर अटक-भटक नि
डांडी कांठी शांत च प्यारी
कतगि छविं छन शब्द नि मिलदा
पंवड़ा गीत सुणौण कु

मेलुड़ि गांदि बासदी हिलांस
परदेस्यों तैं लगदी पराज
फूलुं कि घाटी पंवाळी बुग्याळ
ऊंचा हिमाला चमकुद ताज
फ्योंली बुरांस खिलखिल हैंसदा
संगति बस्यूं च मौल्यारी राज
आज अयूं छौं यखमु मि त
पाड़ी मान बिंगौंण कु
Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari
« Last Edit: March 05, 2010, 10:29:19 PM by धनेश कोठारी »
जैकि अपणि बोली नि भाषा नि समझा वेकि ब्वै अर बुबा नि_जीवानन्द श्रीयाल

Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"

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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
"सुबेर अपणा पहाड़"

डांड्यौं  मा घाम आई'
ह्वैगि  ऊजाळु तिबारी मा,
सुबेर राति काळी,
बोडा जी जमाण लाग्यां,
बोडिन  चा उमाळी.

बोडाजिन पिनि फटाफट,
टपटपु चा कु गिलास,
अर गोरु बाछरू तैं खलाई,
हरयुं हरयुं घास.

ऊठिग्यन  नाती नतणा,
होणु छ किब्लाट,
हल्सुंगी काँधी मा धरि बोडा,
लागिगी डोखरा  का बाट.

नाती नतणा बस्ता लीक,
उकाळि का बाटा जाणा स्कूल,
पुंगड़्यौं फुन्ड खिल्यां छन,
लय्या, पय्याँ, फ्योंलि का फूल.

यनि रैं पैं रंदि छ,
"सुबेर अपणा पहाड़",
कुमाऊँ अर गढ़वाल,
दूर देश मा कखन देखण,
यु छ मन मा सवाल?

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित ७-४-२०१०)
Bagi-Nausa(chandrabadni) to Delhi
E-Mail: j_jayara@yahoo.com
कितनी सुन्दर देव-भूमि, देखूं उड़कर आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं,जाकर बिल्कुल पास से...रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"

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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
कविवर कोठारी जी....गढ़ गाथा..."जलम्या कू गर्व" रचना का माध्यम सी....मैकु भौत सुन्दर लगि.  लिख्दु रवा अनूभूति....मेरी सुभकामना छ.  
जलम्यां कु गर्व

गर्व च हम
यिं धरती मा जल्म्यां
उत्तराखण्डी बच्योंण कु
देवभूमि अर वीर भूमि मा
सच्च का दगड़ा होण कु

आज नयि नि बात पुराणी
संघर्षै कि हमरि कहानी
चौंरा मुंडूं का चिंणी भंडारिन्
ल्वै कि गदन्योन् घट्ट रिगैनी
लोधी रिखोला जीतू पुरिया
कतगि ह्‍वेन पूत-सपूत
ज्यू जानै कि बाजि लगौण कु

गंगा जमुना का मैती छां हम
बदरी-केदार यख हेमकुण्ड धाम
चंद्र सुर कुंजा धारी माता
नन्दा कैलाश लग्यूं च घाम
भैरों नरसिंग अर नागरजा
निरंकार कि संगति च हाम
पांच परयाग हरि हरिद्वार
अपणा पाप बगौण कु

मान सम्मान सेवा सौंळी
प्यार उलार रीत हमरि
धरम ईमान कि स्वाणि सभ्यता
सब्यों रिझौंदी संस्कृति न्यारी
धीर गंभीर अटक-भटक नि
डांडी कांठी शांत च प्यारी
कतगि छविं छन शब्द नि मिलदा
पंवड़ा गीत सुणौण कु

मेलुड़ि गांदि बासदी हिलांस
परदेस्यों तैं लगदी पराज
फूलुं कि घाटी पंवाळी बुग्याळ
ऊंचा हिमाला चमकुद ताज
फ्योंली बुरांस खिलखिल हैंसदा
संगति बस्यूं च मौल्यारी राज
आज अयूं छौं यखमु मि त
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कितनी सुन्दर देव-भूमि, देखूं उड़कर आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं,जाकर बिल्कुल पास से...रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"

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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
"आधी आबादी"

लिख रही हैं नए दौर में,
नित नित नयी कहानी,
आज वक्त ने करवट बदली,
सृजन की कीमत पहचानी.

ओढ़ लिया है आत्मविश्वास,
घूंघट बात पुरानी,
काल के कपाल पर लिख दिया,
नहीं है बात सुहानी.

अपने देश में देखो आज,
कुर्सियों पर है कब्ज़ा,
कर रही हैं कुशल नेतृत्व,
कोई नहीं है हर्जा.

नेताओं के नखरों ने,
"आधी आबादी" को,
उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिलाया,
हो जाए बिल मंजूर,
महिला दिवस पर आज,
सही वक्त है आया.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित ८-४-२०१०  "महिला दिवस" पर )
कितनी सुन्दर देव-भूमि, देखूं उड़कर आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं,जाकर बिल्कुल पास से...रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"

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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
"पर्वतीय महिलाएं"

तन से प्यारा होता है,
उन्हें घास का तिनका,
उत्तराखंड की पहाड़ियों पर,
पशुओं के लिए  घास काटते,
कहीं दूर जलश्रोत से,
गागर में पानी लाते हुए,
जंगल से चूल्हे के लिए,
सूखी लकड़ी लाते हुए,
पति और  परिवार की सेवा,
सच्चे भाव से करते हुए,
सामाजिक बुराईयौं से,
सर्वदा लड़ते  हुए,
बीतता है कठिन  जीवन जिनका,
वे हैं "पर्वतीय महिलाएं",
पहाड़ जैसे इरादों का संकल्प,
मन में धारण किए.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित ९.३.२०१०)
« Last Edit: March 09, 2010, 03:20:13 PM by जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसू" »
कितनी सुन्दर देव-भूमि, देखूं उड़कर आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं,जाकर बिल्कुल पास से...रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"

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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
"अपना गाँव"

जिंदगी रोशन करने के लिए,
सपने साथ लिए,
एक दिन छोड़ दिया मैंने भी,
पर्वतों की गोद में बसा,
अपना प्यारा गाँव.

मैं समय-समय पर जाता रहा,
जबकि मेरे गाँव में,
आज स्थाई रूप से,
पँहुच चुकी है,
बिजली, सड़क और पानी,
एक  प्राइमरी  स्कूल भी.

लेकिन! रुका नहीं सिलसिला,
गाँव को अल्विदा कहने वालों का,
रह गए सिर्फ कुछ मवासे,
आज जिनकी वजह से,
गाँव के कुछ घरों में,
अभी नहीं लगे ताले.


सोचता था रौनक रहेगी,
गाँव की चौपाल में,
खेत और खाल्याण में,
पानी के धारे में,
बरगद और पीपल के नीचे,
धारे के निकट तप्पड़ में,
लगते रहेंगे मंडाण,
संस्कृति की झलक और,
ब्यो बारात की रसाण.

गाँव ने कभी नहीं कहा,
तुम लौटकर मत आना,
शहर ने भी नहीं बुलाया,
गाँव में बिखरा है बचपन,
फिर भी न जाने क्योँ?
प्रवासी ग्रामवासिओं ने,
अपने गाँव को भुलाया,
कवि "ज़िग्यांसु" भूल न सका,
गाँव की याद ने सताया भी,
कसक उठी और रुलाया.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित १०.३.२०१०)
गढ़वाल की गाड़ी से बागी-नौसा, चन्द्रबदनी से दिल्ली.
 
कितनी सुन्दर देव-भूमि, देखूं उड़कर आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं,जाकर बिल्कुल पास से...रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

Offline धनेश कोठारी

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Kamal Kamal Kamal  :smiley32: :smiley32: :smiley32: :smiley32:
"अपना गाँव"

रह गए सिर्फ कुछ मवासे,
आज जिनकी वजह से,
गाँव के कुछ घरों में,
अभी नहीं लगे ताले.

गाँव ने कभी नहीं कहा,
तुम लौटकर मत आना,
शहर ने भी नहीं बुलाया,
 


जैकि अपणि बोली नि भाषा नि समझा वेकि ब्वै अर बुबा नि_जीवानन्द श्रीयाल

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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...

"अलकनंदा"
 
एक नदी ही  नहीं,
सभ्यता और संस्कृति,
संजोए है पहाड़ की,
अपने में समाहित करके,
बह रही है निरंतर,
युगों से पहाड़ पर,
अल्कापुरी  से सागर तक.

कल्पना करो,
यदि अलकनंदा नहीं होती,
तो पंच प्रयाग नहीं होते,
आस्तिक हमारे देश के,
पवित्र स्नान करके,
तटों पर इसके,
शुभ पर्वों पर,
पाप कैसे धोते?

निर्मल नीर अलकनंदा का,
कहीं कोलाहल करते हुए,
निरंतर बहता जाता,
प्रदूषित नहीं करना मुझे,
सन्देश अपना बताता.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा  "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित ११.३.२०१०)
बागी-नौसा(चन्द्रबदनी), टिहरी गढ़वाल
E-mail: j_jayara@yahoo.com
Contact: 09868795187
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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
    "ऋतु बसंत में"

पीली साड़ी पहन,
ऋतु बसंत में,
पहाड़ के एक पाखे में,
काट रही वह घास,
सोच रही लौटेंगे वे,
बहुत दिनों से दूर हैं,
बसंत की बयार आने से,
मन में जगि है आस.

कोलाहल करते पोथ्ले,
तोता, घुघती, हिल्वांस,
फूलों  के लिए  फूल्यारी,
घूम रहे खेतों और पाखों  में,
फूल रही है सांस.

खिले हैं सर्वत्र बण में,
साखिनी, बुरांश,गुरयाळ,
ऋतु बसंत के रंग में रंगे,
हमारे प्यारे मुल्क
रंगीलो कुमाऊँ,
और छबीलो गढ़वाळ.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित १०.३.२०१०)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल.
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बसंत

बसंत
हर बार चले आते हो
ह्‍यूंद की ठिणी से निकल
गुनगुने माघ में
बुराँस सा सुर्ख होकर

बसंत
दूर डांड्यों में
खिलखिलाती है फ्योंली
हल्की पौन के साथ इठलाते हुए
नई दुल्हन की तरह

बसंत
तुम्हारे साथ
खेली जाती है होली
नये साल के पहले दिन
पूजी जाती है देहरी फूलों से
और/ हर बार शुरू होता है
एक नया सफर जिन्दगी का

बसंत
तुम आना हर बार
अच्छा लगता है हम सभी को
तुम आना मौल्यार लेकर
ताकि
सर्द रातों की यादों को बिसरा सकूं
बसंत तुम आना हर बार॥
Copyright@ Dhanesh Kothari
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Offline bckukreti

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                 एक दूसरे को नंगा करने वाला खेल
            by Bhishma Kukreti
हमरे भवन में खुला आंगन है और छोटे  बच्चों को खेलने के लिए प्रयाप्त स्थान है
आज दिन मैं भवन के पिछवाड़े गया तो वहाँ  छोटे छोटे बच्चे एक अनोखा खेल  खेल रहे थे
एक बच्चा दुसरे बच्चे की कमीज फाड़ रहा था और सभी बच्चे खित खित कर हंसकर चिल्ला रहे थे ," वोह यह नंगा हो गया , यह नगा हो गया "
फिर दुसरा बच्चा किसी और के कपडे फाड़ने लगता और अन्य बच्चे चिल्लाते " अरे कपडे में तो यह भला लगता है पर नंगा बिलकुल बेकार लगता है , गंदा लगता है, डरावना लगता है "  इसी तरह एक दुसरे के कपडे फाड़ फाड़ कर सभी बच्चे नंगे  हो गए और बेशर्मी से एक दुसरे को शर्मिन्दा कर रहे थे
   एक दुसरे को नंगा  करने के इस  का खेल में सभी बच्चों को बेहद मजा आ रहा था . वै भूल गए कि उन्हें कोइ और मानव भी देख रहे हैं , नंगा करने का खेल ही होता इतना मजेदार है
इस बीच भवन के बुजुर्ग लोग भी वहां आ गए उन्होंने बच्चों से कहा कि यह गंदा खेल क्यों?
सभी बच्चों ने कहा , " हमने यह सब आप सब से सीखा है . आप भी तो एक दुसरे  की बुराई कर एक दुसरे को नंगा करते हो , एक दुसरे पर कीचड उच्चालते हो, हम तो केवल खेल खेल में एक दुसरे को नंगा कर रहे हैं . आप तो एक दुसरे को बीच चौराहे में नंगा करते हैं ..."
हम बुजर्गों के पास इन बच्चों के उलाहने का कोइ उत्तर नहीं  था
Copyright @Bhishma Kukreti

--

Offline bckukreti

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                         फुल  संगरांद
                         भीष्म कुकरेती
 
प्रिय साथियों !!
महाराष्ट्र में गुडी पडवा का त्यौहार एक विशेष व् महत्व पूर्ण त्यौहार है
गढ़वाल में इसे फूल संगरांद के नाम  से जाना जता है .उत्तराखंडियों का विश्वाश है की देवता फूलों में वास करते हैं चैत माह के प्रथम दिवस से शक वरस शुरू होता है
गढ़वाल में इस दिन से कन्याएं रात फूल चुनकर लाती हैं और  सुबह देहरी में डालती हैं. यह क्रम विखोत (बैशाखी ) (baisaakh ka pratham divas ) तक चलता है यही कारण है की गढ़वाली में चैत महीने को फूलों मैना बि कहते हैं
इसके पीछे  मान्यता है की पार्वती ने शिव जी को पाने हेतु बारह बसंत तक फूलों से अर्चना की थी और इसी प्रथा के निर्वाह हेतु गढ़वाली कन्यायें रात को फूल चुनने के अलावा शिव की प्रार्थना भी करती हैं कि उन्हें योग्य वर मिले
दूसरी  मान्यता है की चैत या वसंत में रती ने कामदेव को प्रसन्न करने हेतु आडू, पैंयाँ (पद्म )  के फूलों से प्रार्थना की थी और कामदेव को प्राप्त किया था. इसीलिये कन्यायें फूलों को चुनती हैं और देहरी में डालती हैं और पयाँ व् आडू के पेड़ कि पूजा भी करती हैं
मै आप  सभी को सपरिवार फुलदेई संगरांद को बधाई  देता हूँ कि ----
फूलदेई -फूलदेई -फूलसंग्रांद
सुफल करो नयो साल तुमको श्री भगवान्
रंगीला सजीला फूल ऐगी , डाळ बुत हर्याँ ह्वेगीन
पौन पंछी दौड़ गेन , डाल्युं फूल हंसदा ऐन
तुमारा भण्डार भर्यान , अन्न धनं मा  बरकत ऐन
औंद रायो ऋतु मॉस , होंड रयान सब्युंक संगरांद
बच्यां रौंला हम तुम त फिर होली फूल संगरांद
फुलदेई, फुलदेई फूल   संगरांद
सभी को फूल संगरांद या गूडी पडवा की पुन्ह बधाई
सन्दर्भ :डॉ शिवा नन्द नौटियाल , फुलदेई , स्वतंत्र भारत, 1975
Copyright@ Bhishma Kukreti

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  • मुट्ठियां भींचो मगर, मुट्ठियों में लावा भरकर, मुट्ठियों को तान दो।
प्रियतमा बिन उदास होता है बसन्त
ढलका कर ओंस की बूंद रोता है बसन्त

सुबह उडारी भरते पंछी भी लौट आते हैं
सांझ में खुद को अकेला पाता है बसन्त

खिलखिलाने को होती है जब भी जोर-जबर
हंसने से खुद को रोक जाता है बसन्त

इस आबो-हवा में कैसे जीने का मन करे
आसमान को ताकने पर डर जाता है बसन्त

ऐसे लाल, हरे, पीले, नीले होने से क्या फायदा
शायद आयेगी बहार ‘धनेश’ इन्तजार में रहता है बसन्त॥
Copyright@ Dhanesh Kothari
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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
   "हमारा पहाड़"

ऋतु बसंत  के रंग में,
रंग गया  है,
क्योंकि, रंग बिरंगे फूल,
खिले हुए हैं सर्वत्र,
पाखों,गाड, गदनों और,
गांवों की सारों में,
बह रही है बसंत की बयार.

विचरण कर रहे हैं,
देवभूमि के देवता,
पर्वत शिखरों और,
ताल, बुग्यालों पर,
जहाँ बह रही है,
धीमी-धीमी बासंती हवा,
मन को मदहोश करने वाली.

कहीं दूर से देख रही हैं,
हिंवाली काँठी जैसे,
चौखम्बा, त्रिशूली, पंचाचूली,
नंदाघूंटी, केदारकांठा,
आपस में अंग्वाल मारकर,
हमारे पहाड़ पर छाए बसंत को,
जिसने उन्हें आकर्षित कर लिया है,
लेकिन, वो बेखबर है.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्विधिकार सुरक्षित १४.३.२०१०)
E-mail: j_jayara@yahoo.com
« Last Edit: March 15, 2010, 03:40:08 PM by जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसू" »
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