AuthorTopic: Uttarakhandi e-Magazine - उत्तराखंडी ई-पत्रिका  (Read 45116 times)

Offline "गढ़वाल सम्राट" पंवार विपिन चंद्र पाल सिंह

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  • ये दिल है बड़ा ही दीवाना; छेड़ा न करो इस पागल को
bahut sundar jayra ji...


Quote
बीनू कुकरेती जी कहाँ हो,
मैंने देखा आपका निवास,
बहुत मनमोहक लगा मुझे,
नैथाना चौरास.

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"मातृभूमि, मातृसंस्कृति और मातृभाषा। यह तीन देवियां हैं, इनका सम्मान करना चाहिए। इनही से ही संसार में सम्मान मिलता है।"
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Offline "गढ़वाल सम्राट" पंवार विपिन चंद्र पाल सिंह

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  • ये दिल है बड़ा ही दीवाना; छेड़ा न करो इस पागल को
" मिन कख बोली  अर क्या बोली  ?"

                हमरा गौमा   " क्य बुलद अर क्य करद "  वाली  एक ददी  छै !     वा  सरया गौमा    ये,  ई  नाम  से जणै  भी   जांदी  छै !  या उपाधी वी  थै  सुधी -सुधी  नि मिली ! बर्षो  क तजुर्बा अर अभ्यास से वीं हासिल कोरी  !मयारू बुलाणो  मतलब   युच की , कुछ कैकी मील !  !  अब देखा ना हमरा पहाडमा ,  वखकी ब्वारियु थै  उपाधी उ थै   इनी मील  जन्दीन  मुफ्तमा ,  बिना कुछ करया !   उदाहरण का वास्ता  केकु आदिम   अगर  मास्टर    चा ..,  त , गौका सबी छोटा बड़ा वीथै मास्टरयाणी कैई  की बुलोंदन !   लगिना  फीती ,  ...    बिना कुछ करया !  मजेकी बात बाठी या पैणा बटण दां भी,   इनी बुलैजांद की   मास्टरयाणी करो कु  !  अब देखा ऩा सुबेदारै बीबी खुनै सुबोद्नी , डाक्टरी बीबी खुणई -डाक्टरीणी,  सीपै  की बीबी खुणई - सीपैणी   त    इनी वी द्दी पर भी भीती लगि गे छे वीकी क्या बुन आर क्यं कन पर !  कुछ अपबाद भी छन ये बिषय पर , जनकी  नेता की बीबी खुणी  कवी...,   नेत्याणी नि बुलद !  गल्दारै बीबी खुणी,   कवी भी गल्दारणी नि बुलद !

              वी ददी की खाशियत  छाई`  की,  पैली त,   केका भी बारमा लम्बी लम्बी  छोड़ी !  इनै उनै की लगे की  !  सरया गौमा बबाल मचाई की बदनाम कैकी  फिर बुल्दी छाई  की मिन कबरी बोली,  अर क्या बोली अर कैमा बोली ! एक मिनटम   मुकरी जादी छई   वा हमरा देसाका नेतौओ  की  जनी  ! 

              एक दा त,  वीन  गौका  एक भला आदिम का वास्ता इनी बात,   अर इनी छुई....,    उभी,    ठुसकी -फुसकी लगिकी  बदनाम कैदी !  उ त फांस  खाद खांद बचेदे लुखुल ! बादम पता लगी,   की,   ये सब काम वी दादी का छन ! जब भरी पंचैतं म ,  वीसे पुचैगी   की तिल इनु किले कारी , अर इन किले बोली ?   वा साफ़ मुकरी ग़े मिन बोली नि जू तुम छा बुना !    उदाहरण  दे देकी बुन बैठी मिनट इनु बोली  जैकू अर्थ समनी वालों ण गलत लगाई... ! मयारू फ्जितु से कवी जातीय  दुश्मुनी अर ण वैल मयारू  पुंगडो   उज्याड खलाई त फिर इन किले बुलुलू  ! वीक कु  यु  तर्क  पंचैतं  जत्गा छा सबी एक हैंक कु मुख दिखण लगिनी ! अब ब्वाल त क्या ब्वाला ..  ??   अर ,   ददी  उख  बीटी  चौड़ी   छाती  कैकी इन गे,  जन बुलिंद  वा कारगिल पर  तिरंगा फैरैकी की जाणी  होली ! या हाई स्कुल्म फर्स्ट आइ होली ! इनी कारनाम त   वीन एक ना कई दफा  कैनी !  हर दफा झूट बोली साफ़  निकललें की कला देखी !   गौ वालो न कतका दफा बोली को तू इलेक्शन  में खड़ी ह्वेजा !  त्वेम नता बाणा सबी गुण छन !  पता  वीकू जबाब क्या छो ??  फुन्डू  फुका ...  उ , नेताओं थै  !   जू पांच साल तक  भी  नि  रैन्दा ! अर जू रैनद  भी छन,   उ थै ,  आदिम त आदिम कुकर  तक भी नि पुछुदू   !  मी जब तक रो,  अर जब तक चों ,    ई पध्बी पर बरकारा रोलु !
 
     पता  वीकू जबाब क्या छो ??  फुन्डू  फुका ...  उ , नेताओं थै  !   जू पांच साल तक  भी  नि  रैन्दा ! अर जू रैनद  भी छन,   उ थै ,  आदिम त आदिम कुकर  तक भी नि पुछुदू   !  मी जब तक रो,  अर जब तक चों ,    ई पध्बी पर बरकारा रोलु !
 
       ददील  ईक हैंक्य पैंतरा फेंकी ...  ब्याली एक , एस एम् एस  कैल भेजी .. की  पहलाणु   इनु छो बुनू  अर आज फिर एक एस एम् एस आई की ना जी ना...  आपल गलत समझ दे मिट ये ना या चों बुनू  !  अब बोला मी कख चों गलत  न ..न..न..   अर मं क्या बोली ताबा ?
 
पराशर गौड़
२८ जनबरी २०१० रात ८ ..४६   पर
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"मातृभूमि, मातृसंस्कृति और मातृभाषा। यह तीन देवियां हैं, इनका सम्मान करना चाहिए। इनही से ही संसार में सम्मान मिलता है।"
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Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"

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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
"पित्रकूड़ी"

यीं दुनिया बिटि  जब कैकु,
ह्वै जान्दु छ  मुंड निखोळु,
तब वैकु धौळि  का छाला,
दाह संस्कार  करिक,
ल्ह्यौन्दा छन एक गंगलोड़ी,
ज्व  परम्परा छ,
हमारा पहाड़ की.

पित्रकूड़ा की पठाळ  हटैक,
पूजे जान्दी  छ गंगलोड़ी,
ज्व बणि  जान्दी पित्रलोड़ी,
अर धरे जान्दी  पित्रकूड़ी फर,
एक पित्र का रूप मा,
परम्परा का अनुसार.

बोल्दा छन पहाड़ मा,
पूजि पित्र अर  लगि पठाळ,
क्या सदानि रलि या परम्परा,
मन मा ऊठणा छन सवाल.

पहाड़ मा पित्रकूड़ी  रलि,
जांका निब्त लोग जाला  वख,
याछ कवि "ज़िग्यांसु" की अनुभूति,
अर मन पौछ्युं छ झनाऊ,
जुछ जयाड़ा जाति कू पुरातन गौं,
अर पित्रकूड़ी आज भिछ जख.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
१ फ़रवरी, २०१०.  समय: ५ बजे सायं
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखंड पोर्टल पर प्रकाशित)
« Last Edit: February 02, 2010, 02:32:50 PM by जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसू" »
कितनी सुन्दर देव-भूमि, देखूं उड़कर आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं,जाकर बिल्कुल पास से...रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

Offline राजू भट्ट

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  • लात भुलेंद पर बात नि भुलेंद
पूजि पितृ अर लगि पठाल
मन मा उठना कनि सवाल
मन्खी नि रै वख चोपाया नि राइ
पितरू क कु करलू ख्याल
"पित्रकूड़ी"

यीं दुनिया बिटि  जब कैकु,
ह्वै जान्दु छ  मुंड निखोळु,
तब वैकु धौळि  का छाला,
दाह संस्कार  करिक,
ल्ह्यौन्दा छन एक गंगलोड़ी,
ज्व  परम्परा छ,
हमारा पहाड़ की.


रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
१ फ़रवरी, २०१०.  समय: ५ बजे सायं
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखंड पोर्टल पर प्रकाशित)


पैली गढदेश  त्वीकु नमस्कार च
तेरी हम पर दयादृष्टि अपार च
तेरी छाया माँ हमकु बडी  मोज च
वीर पुत्रू की तेरी खडी  फौज च

Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"

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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
गौड़  साब सिमन्या,

आपकी या गौं की दादी फर लिखिं बात, मेरा मन तैं  पहाड़ की याद ताजा करौणि छ.....
दादी कू चरित्र..."क्या कन्या क्या बोन्न्यां"  लगणु छ.....आपतैं आज भी गौं की यी बात्त याद छन.....
मैं यनु लगदु  "दादी अब पित्र बणिक....स्वर्ग मा होलि.....या पित्रकूड़ा फर"....     

कितनी सुन्दर देव-भूमि, देखूं उड़कर आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं,जाकर बिल्कुल पास से...रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"

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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
"उत्तराखंड की वीरांगना श्रीमती मगनी देवी रावत"

साखनीधार, बद्रीनाथ  मार्ग के निकट है,
श्रीमती मगनी देवी जी का  गाँव,
बहादुरी की मिशाल उनकी,
विस्मय में डाल देती है,
जब उन्होंने जंगल में,
घास काटते हुए देखा,
तीन बच्चों पर वार करते हुए,
एक बर्बर  रीछ को,
मजबूर कर दिया उसको,
धावा बोलकर पत्थर से,
भाग जाने को तुरंत,
जान बचाकर उल्टे पाँव.
 
 रीछ से तीन बच्चों को बचाकर,
अपने को भी बचाया,
और अपने तीन बच्चों को भी,
माता विहीन होने से,
और प्राप्त किया,
इस महान कार्य के लिए,
भारत की राष्ट्रपति जी  से,
"जीवन रक्षा पदक-२००८".

उत्तराखंडी समाज के लिए,
है न फक्र की बात,
मान बढाओ देवभूमि का,
श्रीमती मगनी देवी जी की तरह,
जिनको देखा कवि  "ज़िग्यांसु" ने,
और ज़िग्यांसावश पूछा उनसे,
उनके साहसिक कार्य का,
आँखों देखा हाल उनकी जुबानी,
जिसे प्रस्ततु कर रहा हूँ,
कविता के रूप में,
क्योंकि मेरे मन में है,
 उनके महान कार्य के लिए,
उनके प्रति सम्मान.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास: संगम विहार, नई दिल्ली
5.1.2010, दूरभास:9868795187
E-Mail: j_jayara@yahoo.com 
« Last Edit: February 04, 2010, 01:50:27 PM by जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसू" »
कितनी सुन्दर देव-भूमि, देखूं उड़कर आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं,जाकर बिल्कुल पास से...रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

Offline "गढ़वाल सम्राट" पंवार विपिन चंद्र पाल सिंह

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  • ये दिल है बड़ा ही दीवाना; छेड़ा न करो इस पागल को
kyaa information layee hai sir....pls upload photgraph 

bakai aur details ho to pls post here
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"मातृभूमि, मातृसंस्कृति और मातृभाषा। यह तीन देवियां हैं, इनका सम्मान करना चाहिए। इनही से ही संसार में सम्मान मिलता है।"
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Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"

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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
"मेरा पहाड़"

आपका भी है प्राण  से प्यारा,
जहाँ जन्म हुआ हमारा और तुम्हारा,
उस दिन हंसी थी फ्योंलि और बुरांश,
हमारे उत्तराखंड पदार्पण पर,
माता-पिता की ख़ुशी में,
शामिल हुए थे ग्राम देवता भी,
ग्रामवासी और पित्र देवता भी.

भूलना नहीं मित्रों पहाड़ को,
हमने अन्न वहां का खाया है,
जैसे कोदा, झंगोरा, कांजू, काफ्लु,
तोर की दाल और कंडाळी  का साग,
लिया जन्म हमनें उत्तराखंड में,
देखो कैसे सुन्दर हमारे भाग.

ज्वान उत्तराखंड कहो या मेरा पहाड़,
कायम रहनी चाहिए आगे बढ़ने की ललक,
उत्सुकता बनी रहे हमेशा मन में,
देखने को उत्तराखंड की झलक.

शैल पुत्रों ये हैं कवि "ज़िग्यांसु" के,
मेरा पहाड़ के प्रति मन के उद्दगार,
पहाड़ प्रेम कायम रहे सर्वदा,
पायें पहाड़ से जीवनभर उपहार.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित, २.२.२०१०)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड.
दूरभास:९८६८७९५१८७
 
कितनी सुन्दर देव-भूमि, देखूं उड़कर आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं,जाकर बिल्कुल पास से...रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"

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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
"बसंत"

वृक्षों ने त्याग दिए पुराने पात,
भांप लिया आने वाला है,
मनभावन ऋतुराज बसंत,
लेकर धरती पर अपनी  बारात.

कोई नायिका पहनेगी पीली साड़ी,
पिया को पास बुलाने को,
जब आएगा बसंत, तब  प्रियतम,
आतुर होगा उसके पास आने को.

बसंत के आने से पहले,
पहाड़ पर ह्युंद में ही आ गई,
फ्योंलि सज धजकर अपने मैत,
उन बेटी ब्वारियों से मिलने,
जो आई हैं ससुराल से मैत.

पय्याँ, आरू, बुरांश, गुर्याळ,
खिलेंगे  जब पहाड़ पर,
धरती पर उतर आये बसंत,
और उसकी मनमोहक अदाएं,
रिझायेंगी कवि मित्रों और "ज़िग्यांसु" को,
एक रैबार आएगा पहाड़ का,
आओ..मौळ्यार के रंग में रंग जाओ,
पहाड़ आकर..अपने गाँव,
 "बसंत" दूल्हा बनकर आया है.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित, ५.२.२०१०)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड.
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कितनी सुन्दर देव-भूमि, देखूं उड़कर आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं,जाकर बिल्कुल पास से...रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

Offline राजू भट्ट

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jaise kisi din chai na piye to kuch adhura adhura sa lagta hai..  jagmohan ji aapki kavitaao ki bhi vaisi hi aadat ho gayee hai
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Offline vivekpatwal

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मरना एक मौत का !

एक तरुण  ने
जैसे ही अपनी यौबन की दहलीज  पर
अपने पाऊ रखे ही थे कि
 मौत  उसे निगल गई !

पंखे से झूलती उसकी लाश
मौन होकर ......
 अपने ऊपर हुए  अत्याचारों का
सबूत दे रही  थी  !
उसका वो मुरझाया चेहरा
उसकी वो लटकी गर्दन
कह रही थी .......
तुम सबने मिलकर मुझे मारा है  ?

मुझे मारा है ...
मेरी माँ/बापा   कि  महत्वाकंशावोने
जो बार बार मुझ   पर  लादी जाती रही है
बिना मेरी , भावनाओं  को समझे  !

मुझे मारा है.....;
मेरे  स्कूल के माहोल ने
जिसने मुझे बार बार प्रताड़ित  किया है
कचोटा हैं , मुझे अन्दर ही अन्दर
हीन भावानौ के बीज बौ बौ  कर !

मुझे मारा है ..
मेरे सीनियरो के घमंड ने
जो मुझे सरे आम हँसी का पात्र  बनाकर
बार बा र मुझे लजित करते रहे
सब के  सामने   !

मै,
 मरना नही चाता था
परन्तु मेरे पास ....,
इसके सिवा कोई बिकल्प भी  नही   था   !

एक बिकल्प था
 " बिद्रोह का  ....//"
"बिद्रोह " .... किस किस  से करता  ?
सब के सब तो
अपने अपने चक्रब्यू  में मुझे
फसाते जा रहे थे .....
जिससे बाहर निकलना
मेरे लिए ना मुमकिन सा था !

मुझे मारा है ....
मेरे अंदर के झुझते  "  मै   '   ने
जो लड़ते लड़ते हार गया था
अपने आप से !

मै मर गया हूँ तो क्या ?

जीने कि लालसा और
उमीदो कि किरन  अभी भी
सेष है .................!

जब तुम सकब लोग .,
मेरी भावनाओं को और
मेरी पीड़ा को समझ लोगे
तब.....
तब , कोई नही मरेगा
और नहीं मारेगा
वो ........
जियेगा एक सुनहरे भविषय  के लिए !

पराशर गौर
५ फरबरी २०१०  ३.४५ दिन में
Vivek Patwal
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जाणु त्यारु
 
छोड़ी  हम साणी
तू जब बिटिकी गे
सूना ह्वीनी  भैर -भित्तर
चौक - डंडयाली  रूवे  !
 
         रात रा  उण्डी-उण्डी
         दिन भी छो कुछ मुरुयु मुरुयु
         छैल डाँडो कु भी  आज
         छो कुछ बूझ्यु  बू झ्यु   
         मुंड घुन्ड़ोक पेट धारी
          बिखुंन देलिम रा रूणी रै  !
 
रौली छे  उदास हुई
ज़ाद देखि त्व़े सणी
बाटा- घाटा छा बुना
दगडी लिजा हम सणी
भित्तर खाली सुनि डंडयाली
आज डंडयाली  ह्वे  ...................  !
 
        सुनू सुनू बोण छो
        सुनोपन सारयूमा
        स्वीणा रीटि रीटि  छा कण सवाल
        ब्व़े की रीती आंखयुमा
         क्याजी देदी वो जबाब  ...
         जब जबाब हर्चिगे   !
 
धुरपलिम बैठ्यु कागा
सोची सोची सुचुदु  रै
चौका तिरोली  लुल्ली  घिनडूडी
 सुस्गुरा ही भुरुदी रै
उरख्यलोंन तापना तूडिन
भित्तर सिल्वाटी   रवे  !   
 
       डाँडि काँठी गाद गदिनी
       छोया रवैनी दिड़ा तोड़ी  की
       धुरपलिम थरप्यु द्य्ब्ता  बुनू
       कन बिजोग आज पोड़ीगी
        धार पोर जान्द देखी त्वै
         गोर -बछरा , गोंडी रामीगे  !
 
पराशर गौर
फरबरी ७ २०१०   ०७०
रात ११ बजे
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"मातृभूमि, मातृसंस्कृति और मातृभाषा। यह तीन देवियां हैं, इनका सम्मान करना चाहिए। इनही से ही संसार में सम्मान मिलता है।"
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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
"देवभूमि मा पड़िगी ह्यूं"

याद ऐगि ऊँ दिनु की,
या खबर सुणिक,
जब सैडि  रात होन्दि  थै  बरखा,
अर सुबेर  उठिक देख्दा था,
ह्यूं पड़युं चौक, सारी, डांडी, कांठयौं   मा,
खुश होन्दु थौ मन हेरि हेरिक,
देवभूमि उत्तराखण्ड मा.

आस जगणि छ मन मा,
खूब होलि फसल पात,
मसूर, ग्युं, लय्या फूललु,
ज्व  छ बड़ी ख़ुशी की बात.

बस्गाळ अबरखण ह्वै,
महंगाई  सी टूटणि  छ कमर,
ह्युंद की बरखा वरदान छ,
नि रलि महंगाई फिर अमर.

पड़िगी ह्यूं बल उत्तराखंडी  भै बन्धु,
औली, हेमकुंड, चोपता, तुंगनाथ, जोशीमठ,
धनौल्टी, त्रियुगीनारायण, ऊखीमठ,
खुश ह्वैगिन देवी देवता जख चार धाम,
डांडी, कांठयौं   मा चमलाणु छ घाम,
सच बोलों त जन चमकदी छ चाँदी.

अपणा मुल्क की जब मिल्दि  छ,
जब यनि भलि खबर सार,
आशा कर्दौं आप भी खुश होन्दा  होला,
"देवभूमि मा पड़िगी बल ह्यूं"
जू ल्ह्यालि खुशहालि अपार.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित १०.२.२०१०)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी.चन्द्रबदनी, टेहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड.
कितनी सुन्दर देव-भूमि, देखूं उड़कर आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं,जाकर बिल्कुल पास से...रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

Offline धनेश कोठारी

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  • मुट्ठियां भींचो मगर, मुट्ठियों में लावा भरकर, मुट्ठियों को तान दो।
Jayara ji Aashu kavi ke roop mein aapka jawab nahi.

Offline vivekpatwal

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Jayara ji Aashu kavi ke roop mein aapka jawab nahi.


सही कहा आपने धनेश जी,  :hello2:
Vivek Patwal
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