Author Topic: Literary Legend-Shri Sumitra Nandan Pant  (Read 5970 times)

Offline vivekpatwal

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Literary Legend-Shri Sumitra Nandan Pant
« on: January 15, 2006, 11:01:38 AM »
Sumitranandan Pant (1900 - December 28, 1977) was one of the most famous modern  Hindi poets.
Pant was born at Kausani village of  Almora, in the hills of Kumaon.

Pant received  Jnanpith Award for collection of his most famous poems, titled Chidambara.
Sumitranandan Pant (1900-1977) authored twenty eight published works including poetry, verse plays and essays.
Born in Kausani, in the hills of Kumaon, Pant's early years were spent in great poverty.
Mahadevi Verma was one of the four pillars of the great Romantic movement in modern Hindi poetry, Chhayavada, the remaining three being Suryakant Tripathi 'Nirala', Jaishankar Prasad and Sumitranandan Pant.
Vivek Patwal
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Re: Literary Legend-Shri Sumitra Nandan Pant
« Reply #1 on: January 24, 2006, 09:56:21 AM »
Just one query??

Did he ever asserted his Uttaranchali identity in any public forum or through his writings??

Offline vivekpatwal

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Re: Literary Legend-Shri Sumitra Nandan Pant
« Reply #2 on: January 24, 2006, 10:20:37 AM »
Dear Sir,
I am fully agree with your statement, but when we go back to history we cant detach Legendary person from our Uttaranchal.
But by the way you started the topic then many question raises...
1. What Mr. N.D. Tiwari do for our Uttaranchal when he was Chiefminister Of Uttar Pradesh three times.
2. Why we forget Mr. Chandra Bhanu Gupta who started major development programme in Uttaranchal (when he was CM of Uttar Pradesh).
3. And Many other questions....Sports Person of Uttaranchal or other....


Regards,

Vivek
Vivek Patwal
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Offline vijay barthwal

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From wikipedia
« Reply #3 on: December 13, 2006, 05:45:07 PM »
Sumitranandan Pant (सुमित्रानन्‍दन पंत) (May 20, 1900 - December 28, 1977) was one of the most famous modern Hindi poets. He is considered one of the major poets of the Chhayavaadi school of Hindi literature. Pant mostly wrote in Sanskritized Hindi. Pant authored twenty eight published works including poetry, verse plays and essays.

Pant was born at Kausani village of Almora, in the hills of Kumaon. His mother died within a few hours of his birth. He was given the name Gosain Dutt. His initial schooling took place in Almora. After matriculation he moved to Kalakankar near Prayag. He did not like his name so he gave himself a new name "Sumitranandan Pant".

The mark of the childhood in the hills can be seen in his works and his poems resound with an echo of the beauty of nature. He was a shy and girlish child and his classmates often used to tease him calling him 'girl'. For his graduation, Pant went to Prayag University. On hearing Mahatma Gandhi's call for Satyagraha, he left college. However, he continued his education by reading English, Sanskrit and Bengali literature. After some time, he went to Sri Aurobindo's ashram at Pondicherry.

Apart from Chhayavaadi poems, Pant also wrote progressive, philosophical (influenced by Sri Aurobindo), socialist and humanist poems.

Pant received Jnanpith Award for collection of his most famous poems, titled Chidambara. He was awarded Nehru Peace Prize by Soviet Union for Lokayatan.

Pantji's childhood house, in Kausani, has been converted into a museum. This museum displays his daily use articles, drafts of his poems, letters, his awards etc.


Major works
Veena, Uchchhavaas, Pallava, Granthi, Gunjan, Lokayatan Pallavini, Madhu Jwala, Manasi, Vaani, Yug Path, Satyakaam.

mahapanchayat ke faisle ke baad hi mein duty join karoonga ya resign kar doonga.

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Offline vijay barthwal

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tdil website se.....
« Reply #4 on: December 13, 2006, 05:47:20 PM »
उत्तरांचल प्रदेश के कुमाऊँ अंचल के कौसानी गाँव में प्रकृति के सुकुमार कवि सुमुत्रानंदन पंत का जन्म सन् १९०० में हुआ। जन्म के छह घंटे बाद ही माँ को क्रूर मृत्यु ने छीन लिया। शिशु को उसकी दादी ने पाला पोसा। शिशु का नाम रखा गया गुसाई दत्त।

गुसाई दत्त की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा में हुई। सन् १९१८ में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी आ गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद वे इलाहाबाद चले गए। उन्हें अपना पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नाम रख लिया - सुमित्रानंदन पंत। यहाँ म्योर कॉलेज में उन्होंने इंटर में प्रवेश लिया। महात्मा गांधी के आह्मवान पर अगले वर्ष उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे।

सुमित्रानंदन सात वर्ष की उम्र में ही जब वे चौथी कक्षा में पढ़ रहे थे, कविता लिखने लग गए थे। सन् १९०७ से १९१८ के काल को स्वयं कवि ने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वीणा में संकलित हैं। सन् १९२२ में उच्छवास और १९२८ में पल्लव का प्रकाशन हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं - ग्रंथि, गुंजन, ग्राम्या, युंगात, स्वर्ण-किरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, निदेबरा, सत्यकाम आदि। सन् १९७७ में सुमित्रानंदन पंत का देहावसान हो गया।

अपने कृतित्व के लिए पंत जी को विविध पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। कला और बूढ़ा चाँद के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, लोकायतन पर सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार एवं चिदंबार पर इन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ।

पंत जी की प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति-प्रेम और सौंदर्य की छटा मिलती है, जिसका उत्कर्ष उनकी छायावादी रचनाओं पल्लव और गुंजन में देखने को मिलता है। सन् १९३६ के आस-पास वे माक्र्सवाद से प्रभावित हुए। युगांत और ग्राम्या की अनेक रचनाओं पर माक्र्स का प्रभाव स्पष्ट रुप से देख जा सकता है। कवि की उत्तरकालीन रचनाओं पर अरविंद की विचारधारा की छाप है।

पंत जी सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति और सचल दृश्यों के चित्रण में अन्यतम हैं। इनकी भाषा बड़ी सशक्त एवं समृध है। मधुर भावों और कोमलकांत गीतों के लिए सिधहस्त हैं।

आ: धरती कितना देती है, कविता में कवि अपने बचपन की एक भूल को याद करते हुए धरती को रत्न प्रसविनी रुप का चित्रण कर रहा है। 'हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे' का संदेश देते हुए कवि ने मानवता की फसल उगाने के लिए समता, ममता और क्षमता के बीज बोने पर बल दिया है।
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Re: Literary Legend-Shri Sumitra Nandan Pant
« Reply #5 on: December 13, 2006, 05:54:13 PM »
All other internet sources are dependent on wikipedia for information about legendary poet Sumitranandan pant.

Young Uttaranchal ji,

shaayad itna kaafee hai Sumitranandan Pant ko Uttarakhand se jodne ke liye.

PAtwal ji,

Chandra Bhan Gupt meri nazar mein Uttarakhand se sambandhit hein aur shaayad Jitna Sunita Williams India se sambandhit hai, usse kahin jyada CB Gupt UA se jude rahe hein
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Offline vivekpatwal

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Re: Literary Legend-Shri Sumitra Nandan Pant
« Reply #6 on: February 22, 2007, 04:52:12 PM »
ONE POEM BY PANT JI,

Vivek Patwal
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Offline vivekpatwal

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Re: Literary Legend-Shri Sumitra Nandan Pant
« Reply #7 on: May 05, 2007, 05:33:38 PM »
उत्तरांचल प्रदेश के कुमाऊँ अंचल के कौसानी गाँव में प्रकृति के सुकुमार कवि सुमुत्रानंदन पंत का जन्म सन् १९०० में हुआ। जन्म के छह घंटे बाद ही माँ को क्रूर मृत्यु ने छीन लिया। शिशु को उसकी दादी ने पाला पोसा। शिशु का नाम रखा गया गुसाई दत्त।

गुसाई दत्त की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा में हुई। सन् १९१८ में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी आ गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद वे इलाहाबाद चले गए। उन्हें अपना पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नाम रख लिया - सुमित्रानंदन पंत। यहाँ म्योर कॉलेज में उन्होंने इंटर में प्रवेश लिया। महात्मा गांधी के आह्मवान पर अगले वर्ष उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे।

सुमित्रानंदन सात वर्ष की उम्र में ही जब वे चौथी कक्षा में पढ़ रहे थे, कविता लिखने लग गए थे। सन् १९०७ से १९१८ के काल को स्वयं कवि ने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वीणा में संकलित हैं। सन् १९२२ में उच्छवास और १९२८ में पल्लव का प्रकाशन हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं - ग्रंथि, गुंजन, ग्राम्या, युंगात, स्वर्ण-किरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, निदेबरा, सत्यकाम आदि। सन् १९७७ में सुमित्रानंदन पंत का देहावसान हो गया।

अपने कृतित्व के लिए पंत जी को विविध पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। कला और बूढ़ा चाँद के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, लोकायतन पर सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार एवं चिदंबार पर इन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ।

पंत जी की प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति-प्रेम और सौंदर्य की छटा मिलती है, जिसका उत्कर्ष उनकी छायावादी रचनाओं पल्लव और गुंजन में देखने को मिलता है। सन् १९३६ के आस-पास वे माक्र्सवाद से प्रभावित हुए। युगांत और ग्राम्या की अनेक रचनाओं पर माक्र्स का प्रभाव स्पष्ट रुप से देख जा सकता है। कवि की उत्तरकालीन रचनाओं पर अरविंद की विचारधारा की छाप है।

पंत जी सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति और सचल दृश्यों के चित्रण में अन्यतम हैं। इनकी भाषा बड़ी सशक्त एवं समृध है। मधुर भावों और कोमलकांत गीतों के लिए सिधहस्त हैं।

आ: धरती कितना देती है, कविता में कवि अपने बचपन की एक भूल को याद करते हुए धरती को रत्न प्रसविनी रुप का चित्रण कर रहा है। 'हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे' का संदेश देते हुए कवि ने मानवता की फसल उगाने के लिए समता, ममता और क्षमता के बीज बोने पर बल दिया है।

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Re: Literary Legend-Shri Sumitra Nandan Pant
« Reply #8 on: May 07, 2007, 07:56:25 PM »

Dosto,

I have been in Kausoni several times. We are proud that such great legendary have taken birth in Uttrakhand.

IN act Sumitra Nandan Pant had given the name to Big 'B" as Amitabh. Haribans RAi and Sumitra Nandan Pant were close friends in those days.

Very few of you might be knowing about this.




उत्तरांचल प्रदेश के कुमाऊँ अंचल के कौसानी गाँव में प्रकृति के सुकुमार कवि सुमुत्रानंदन पंत का जन्म सन् १९०० में हुआ। जन्म के छह घंटे बाद ही माँ को क्रूर मृत्यु ने छीन लिया। शिशु को उसकी दादी ने पाला पोसा। शिशु का नाम रखा गया गुसाई दत्त।

गुसाई दत्त की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा में हुई। सन् १९१८ में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी आ गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद वे इलाहाबाद चले गए। उन्हें अपना पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नाम रख लिया - सुमित्रानंदन पंत। यहाँ म्योर कॉलेज में उन्होंने इंटर में प्रवेश लिया। महात्मा गांधी के आह्मवान पर अगले वर्ष उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे।

सुमित्रानंदन सात वर्ष की उम्र में ही जब वे चौथी कक्षा में पढ़ रहे थे, कविता लिखने लग गए थे। सन् १९०७ से १९१८ के काल को स्वयं कवि ने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वीणा में संकलित हैं। सन् १९२२ में उच्छवास और १९२८ में पल्लव का प्रकाशन हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं - ग्रंथि, गुंजन, ग्राम्या, युंगात, स्वर्ण-किरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, निदेबरा, सत्यकाम आदि। सन् १९७७ में सुमित्रानंदन पंत का देहावसान हो गया।

अपने कृतित्व के लिए पंत जी को विविध पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। कला और बूढ़ा चाँद के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, लोकायतन पर सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार एवं चिदंबार पर इन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ।

पंत जी की प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति-प्रेम और सौंदर्य की छटा मिलती है, जिसका उत्कर्ष उनकी छायावादी रचनाओं पल्लव और गुंजन में देखने को मिलता है। सन् १९३६ के आस-पास वे माक्र्सवाद से प्रभावित हुए। युगांत और ग्राम्या की अनेक रचनाओं पर माक्र्स का प्रभाव स्पष्ट रुप से देख जा सकता है। कवि की उत्तरकालीन रचनाओं पर अरविंद की विचारधारा की छाप है।

पंत जी सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति और सचल दृश्यों के चित्रण में अन्यतम हैं। इनकी भाषा बड़ी सशक्त एवं समृध है। मधुर भावों और कोमलकांत गीतों के लिए सिधहस्त हैं।

आ: धरती कितना देती है, कविता में कवि अपने बचपन की एक भूल को याद करते हुए धरती को रत्न प्रसविनी रुप का चित्रण कर रहा है। 'हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे' का संदेश देते हुए कवि ने मानवता की फसल उगाने के लिए समता, ममता और क्षमता के बीज बोने पर बल दिया है।


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Offline छैल छबीला

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Literary Legend-Shri Sumitra Nandan Pant
« Reply #9 on: May 09, 2007, 02:46:52 PM »
                     

                        More about him


                        Sumitranandan Pant 


                Sumitranandan Pant  (May 20, 1900 - December 28, 1977) was one of the most famous modern Hindi poets. He is considered one of the major poets of the Chhayavaadi school of Hindi literature. Pant mostly wrote in Sanskritized Hindi. Pant authored twenty eight published works including poetry, verse plays and essays.

Pant was born at Kausani village of Almora, in the hills of Kumaon. His mother died within a few hours of his birth. He was given the name Gosain Dutt. His initial schooling took place in Almora. After matriculation he moved to Kalakankar near Prayag. He did not like his name so he gave himself a new name "Sumitranandan Pant".

The mark of the childhood in the hills can be seen in his works and his poems resound with an echo of the beauty of nature. He was a shy and girlish child and his classmates often used to tease him calling him 'girl'. For his graduation, Pant went to Prayag University. On hearing Mahatma Gandhi's call for Satyagraha, he left college. However, he continued his education by reading English, Sanskrit and Bengali literature. After some time, he went to Sri Aurobindo's ashram at Pondicherry.

Apart from Chhayavaadipoems, Pant also wrote progressive, philosophical (influenced by Sri Aurobindo), socialist and humanist poems.

Pant received Jnanpith Award for collection of his most famous poems, titled Chidambara. He was awarded Nehru Peace Prize by Soviet Union for Lokayatan.

Pantji's childhood house, in Kausani, has been converted into a museum. This museum displays his daily use articles, drafts of his poems, letters, his awards etc.


                                 Major works

Veena, Uchchhavaas, Pallava, Granthi, Gunjan, Lokayatan Pallavini, Madhu Jwala, Manasi, Vaani, Yug Path, Satyakaam.

« Last Edit: May 09, 2007, 02:54:18 PM by BeenuKukreti »
kis KHABEES ne mera signature udaaya hai

Offline हिसालू

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Re: Literary Legend-Shri Sumitra Nandan Pant
« Reply #10 on: May 24, 2007, 10:13:27 AM »
pichale saal mujhe ek inspection tour main kausani jane ka mauka mila aur main bhi pant ji ke ghar gaya tha to aj ek musuem hai, waha per pant ji ki kai books rakhi gai hai, lekin uski halat jyada thik nahi hai, hamari is sanskratik virasat ko bachane ke liye sarkar ko prayas karana chahiye.
 unki ek kavita hai:

bharat mata gramvasini
रंगीलो पहाड़ छूटोऽऽऽऽऽऽऽ सुवा, द्वी रोटि कारण ले........।
http://jayuttarakhand.blogspot.com

Offline Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Re: Literary Legend-Shri Sumitra Nandan Pant
« Reply #11 on: May 24, 2007, 11:07:37 AM »
bhai mere se badi galti ho gai main 3 baar Kausani gaya lekin yeh museum nahi dekha. Is baar jaaunga to jaroor dekhunga.
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Offline राजू भट्ट

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Re: Literary Legend-Shri Sumitra Nandan Pant
« Reply #12 on: June 14, 2007, 07:40:37 AM »
 बागेश्वर। वरिष्ठ साहित्यकार व कुमंविनि के पूर्व उपाध्यक्ष गोपाल दत्त भट्ट ने महा कवि डा नामवर सिंह द्वारा स्व सुमित्रानंदन पंत के साहित्य को कूड़ा-करकट बताए जाने को अशोभनीय करार दिया है। श्री भट्ट ने इस टिप्पणी की निंदा करते हुए कहा कि इससे देश-विदेश के लाखों-लाख पाठकों की भावनाओं को ठेस पहुंची है। उन्होंने कहा कि हिंदी के क्षेत्र में कवि वर स्व सुमित्रानंदन पंत के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। उन्होंने इसे गम्भीर टिप्पणी बताते हुए डा नामवर सिंह से साहित्य जगत से क्षमा मांगने को कहा है।

पैली गढदेश  त्वीकु नमस्कार च
तेरी हम पर दयादृष्टि अपार च
तेरी छाया माँ हमकु बडी  मोज च
वीर पुत्रू की तेरी खडी  फौज च

Offline राजू भट्ट

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Re: Literary Legend-Shri Sumitra Nandan Pant
« Reply #13 on: June 14, 2007, 07:40:58 AM »
Friends, this person, Namvar Singh is a so called, Hindi literature’s criticiser. Delhi doordarshan use him as filler during its programs.  I doubt his capacity to criticise such a talented person. He should definitely apologise for his statement.
पैली गढदेश  त्वीकु नमस्कार च
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Re: Literary Legend-Shri Sumitra Nandan Pant
« Reply #14 on: June 14, 2007, 09:11:08 AM »
Friends, this person, Namvar Singh is a so called, Hindi literature’s criticiser. Delhi doordarshan use him as filler during its programs.  I doubt his capacity to criticise such a talented person. He should definitely apologise for his statement.

Dear Bhatt ji

Dr. Namvar Singh is a Critic not criticiser. (Hindi shabd hai :Samalochak) and is referred as Maha-kavi. Please don't degrade him.
I am not sure in what context he has said "KUDA-KARKAT" for Pantji's litrature and I hope by now he might have apologised for this or clarified his position. I hope it is nothing but some communication gap. Still I strongly support the views of Gopal dutt Bhatt.
Jinkee Maa kubsurat nahi hoote kaya uske bachee use payaar nahi kartee , or ye jameen ye uttarakhand mere maa hai
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