AuthorTopic: पशुओं की सेवा का फल भी जरूरत मिलता है  (Read 130 times)

Offline सुभाष काण्डपाल

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उत्तराखंड के पहाड़ी गांव में एक बहुत ही सीधा साधा सज्जन रहता था! उसके माता पिता ने तो उसका नाम संग्रामसिंह रखा था, लेकिन गाँव के बुजुर्ग उसे प्यार से संग्रामू बुलाते थे!

माता पिता स्वर्ग वासी हो गए थे, छोड़ गये थे पीछे सीढ़ीनुमा खेत जो काफ़ी दूर दूर तक फैले हुए थे, एक बैलों की जोड़ी और थोड़ा सा अनाज जो कम से कम अगली फसल आने तक के लिए काफ़ी हो जाता था ! यह परिवार पुस्तैनी किसान था, दादा खेती ही करते थे, पिता ने भी वही किया और अब संग्रामू भी उसी पैतृक परंपरा को आगे बढ़ा रहा था! वह बहुत ही सीधा था इसलिए गाँव वाले उसका मज़ाक भी उड़ाया करते थे ! शादी हुई और विडंबना देखिए उसकी पत्नी गूंगी थी। नाम था शर्मीली ! ईश्वर की रचना तो देखिए, वह इंसान के कर्मों के अनुसार उसे गूंगा, बहरा, लंगड़ा और काना तो बना देता है लेकिन उसे इज्जत के साथ जीने के लिए कोई विशेष हुनर दे देता है और शर्मीली को भी भगवान ने एक ऐसा ही हुनर दे रखा था जो आम महिलाओं में देखने को नहीं मिलता !

वह इशारों इशारों में अपनी मन की बात सबको आसानी से समझा देती थी और उनकी बातों को समझ जाती थी ! वह बहुत मेहनती और कुशाग्र दिमाग की थी ! अपना काम समय पर निपटा कर अपने संगी साथियों की भी मदद करती थी ! इस तरह उसने अपने लिए सभी उम्र के स्त्री पुरुषों में अपनी एक विशेष जगह बना ली थी ! वह सवेरे सूर्य निकालने से पहले ही उठ जाती थी, गोशाला में जाकर मवेशियों को बाहर निकाल कर उन्हे दाना पानी देना, गोबर को ठिकाने लगाना !

इस गांव में पानी की बड़ी समस्या थी इसलिए दूर से पानी अपने लिए तथा मवेशियों के लिए लाना, खाना बनाना, फिर पति जो सवेरे सवेरे ही खेतों में हल लगाने चला जाता उसके लिए नाश्ता बनाना और लेकर खेतों में जाना ! जब हल लगा कर पति नाश्ता खाने लगते तो शर्मीली का काम शुरू हो जाता ! डले फोड़ना, बैलों को हल से खोलना, उन्हें भी खिलाना पानी पिलाना और उनके कंधों और पूरे शरीर की मालिस करना !

बैलों का भी नाम था, गोरा और कैन टा ! दोनों बैल अपनी मालकिन को खूब पहिचानते थे ! पति तो घर चला जाता था और पत्नी बैलों को चराने के लिए खेतों में छोड़ देती थी और अपने आप साथ ही के जंगल में अन्य महिलाओं के साथ घास काटने चली जाती थी !

एक दिन घास काटने में मग्न थी, साथ के खेत में बैल चर रहे थे, अचानक कहीं से एक बड़ा भारी भरकम देह वाला भालू आ गया ! सारी महिलाएं शोर मचाती हुई की "भालू आया भालू आया", भाग खड़ी हुई, शर्मीली बेचारी गूंगी बहरी उसको क्या पता शोर मच रहा है या भगदड़ मच रही है, वह तो अपने में मस्त होकर घास काट रही थी ! भालू ने उस पर आक्रमण करने के लिए तेज़ी से उसकी तरफ दौड़ लगाई, दोनों बैलों ने भालू को देख लिया ! जैसे ही भालू शर्मीली के नज़दीक पहुँचा, दोनों बैलों ने दोनों तरफ से अपने सींगों से भालू पर ज़ोर दार हमला बोल दिया, नज़दीक पर भालू को देख कर शर्मीली तो बेहोश हो गई ! दोनों बैलों के सींगों से बड़ी मुस्किल से अपने को बचा कर भालू गिरता पड़ता भाग खड़ा हुआ ! शर्मीली की जान बच गई ! भालू घायल हो चुका था ! गाँव में भी खलबली मच गई की शर्मीली को भालू ने खा लिया है, लोग भागते हुए वहाँ आए, देखा दोनों बैल खड़े होकर भागते भालू को देख रहे हैं और शर्मीली बिना कोई चोट खाए बड़े अचरज से अपने प्यारे प्यारे बैलों को देख रही है !

सब लोगों ने बड़े प्यार से दोनों बैलों की मालिश की और पुरे इलाक़े में खबर फैला दी की संग्रामू के दोनों बैलों ने उसकी पत्नी शर्मीली को एक दुर्दांत भालू से बचाया ! पशुओं को प्यार करो तो वे बदले में अपना प्यार जरूर देंगे ! साथ ही, सेवा का फल जरूर मिलता है।

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