AuthorTopic: रंत-रैबार और ख़बर सार (टाइम पास )  (Read 16193 times)

Offline गायत्री

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सुभाष भिया "जय माता दी"
सुभाष भाई आप काहँ थे 
इतने दिन  हो गये है क्या कोई खास कार्य आ गया था


Aur bhai logo kya chal raha hai...............board suna suna lag raha hai............kyon??????????????


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Offline सुभाष काण्डपाल

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ram........ram........Gaytri bhai..............bus thoda sa byast tha...........aap sunaooooooo.....kya chal raha hai....................


सुभाष भिया "जय माता दी"
सुभाष भाई आप काहँ थे 
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Offline सुभाष काण्डपाल

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Aur log kaha hai.............koee bhi nahi dikh raha haiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii

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Offline गायत्री

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बाकी सब लोग दिवाली के लिए गाँव चले गये है , विवेक भाई,  बीनू भाई , विजय भाई है वे लोग थोड़ा  ब्यस्त है कार्य में
हीरा जी  पिछले २ महीने से बोर्ड पर नही है  ;D


Aur log kaha hai.............koee bhi nahi dikh raha haiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii

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« Last Edit: October 14, 2008, 01:42:10 PM by vivekpatwal »

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सुभाष भाई भाभी जी कैसे है

Offline Ashish Panthari

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हीरा जी  पिछले २ महीने से बोर्ड पर नही है  ;D


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 ??? ??? ??? ??? ???

Kise nai bataya tak nahi or Bulana to bahut durrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrr ......................

 ???  ??? ???
« Last Edit: October 14, 2008, 01:42:38 PM by vivekpatwal »
I look to the future because that's where I'm going to spend the rest of my life.(George Burns)

Offline "गढ़वाल सम्राट" पंवार विपिन चंद्र पाल सिंह

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  • ये दिल है बड़ा ही दीवाना; छेड़ा न करो इस पागल को
ye kyaa ho raha hai. koe achhe topic par dicuss karooooooooo doston
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"मातृभूमि, मातृसंस्कृति और मातृभाषा। यह तीन देवियां हैं, इनका सम्मान करना चाहिए। इनही से ही संसार में सम्मान मिलता है।"
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मेरा पागलपन :
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Offline vivekpatwal

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yahan par afwahein na failayein mitro,  :headbang: :headbang: apne personal karyo mein har koi vyast ho sakta hai,  :)
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VIVEK BHAI KYA HUA BEENU BHAI TO NARAZ HO GAYA
LAL CHOWK KI DEWALI KAA KYA HUA


Kuchh nahi sir ji,
Is baar mere liye ab door pad jayega, Kal se mein Indirapuram mein shift ho raha hoon,  ;D
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Offline Ashish Panthari

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Patwal Ji Indrapuram ka address to muje de dejeye.  :)
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सन्दीप काला, vivekpatwal, नेगी दा, Dhirendra Chauhan "Deva", Ashish Panthari, Vijay Butola, snranjeet, अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा " गढ़वाल सम्राट ", Guddu kundlia, naveen payaal, AMIT GUPTA, m_a_n_u, jassi, rajesh.joshee, Sirsed, BeenuKukreti, garwal tiger, princethecharming
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''''''''''''''''''कर ना फ़िर  :cheers:
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Offline सन्दीप काला

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Offline गायत्री

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माहभर बाद मनाई जाती है दीपावली

देहरादून। पूरे देश में रोशनी का त्योहार दीपावली जहां कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाती है वहीं उत्तराखंड में देहरादून जिले के जौनसार बावर और टिहरी, गढ़वाल एवं उत्तरकाशी जिले के रवांई क्षेत्र में एक महीने बाद मार्गशीष मास की अमावस्या को मनाई जाती है।

भारत के उत्तर में बसा उत्तराखंड अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए दुनियाभर में विख्यात है। यहां स्थित देश के सिरमौर पहाड़ों के राजा हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां, ऊंचे पर्वत शिखर तथा उनके बीच मौजूद गहरी घाटियां, कल-कल बहती नदियां सदैव हर किसी को आकर्षित करती हैं। साथ ही यहां के रीति-रिवाज, खान-पान, मेले-त्योहार, रहन-सहन एवं बोली-भाषा हमेशा ही संस्कृति प्रेमियों के लिए शोध के विषय रहे हैं।

देश के लोग जहां कार्तिक मास की अमावस्या के दिन दीपावली का जश्न मनाने में मशगूल रहते हैं वहीं टिहरी-गढ़वाल और उत्तरकाशी के रवांई एवं देहरादून जिले के जौनसार बावर क्षेत्र के लोग सामान्य दिनों की भांति अपने काम-धंधों में लगे रहते हैं, उस दिन यहां कुछ भी नहीं होता है। इसके ठीक एक महीने बाद मार्गशीष [अगहन]अमावस्या को यहां दीपावली मनाई जाती है और यह चार-पांच दिन तक मनाई जाती है। इसे यहां पहाड़ी दीपावली देवलांग के नाम से जाना जाता है।

इन क्षेत्रों में दीपावली का त्योहार एक महीने बाद मनाने का कोई ठीकठाक इतिहास तो नहीं मिलता है लेकिन इसके कुछ कारण भी लोग बताते हैं। कार्तिक महीने में किसानों की फसल खेतों और आंगन में बिखरी पड़ी रहती है, जिस कारण किसान अपने काम में व्यस्त रहते हैं और एक महीने बाद किसान सब कामों से फुर्सत में होकर घर बैठता है, तब यहां दीपावली मनाई जाती है।

कुछ लोगों का कहना है कि लंका के राजा रावण पर विजय प्राप्त कर रामचंद्र जी कार्तिक महीने की अमावस्या को अयोध्या लौटे थे और इस खुशी में वहां दीपावली मनाई गई थी, लेकिन यह समाचार इन दूरस्थ क्षेत्रों में देर से पहुंचा। इसलिए अमावस्या को ही केंद्र बिंदु मानकर ठीक एक महीने बाद दीपोत्सव मनाया जाता है।

एक अन्य प्रचलित कहानी के अनुसार एक समय टिहरी नरेश से किसी आदमी ने वीर माधो सिंह भंडारी की झूठी शिकायत की थी। तब भंडारी को तत्काल दरबार में हाजिर होने का आदेश दिया गया, उस दिन कार्तिक मास की दीपावली थी। रियासत के लोगों ने अपने प्रिय नेता को त्यौहार के अवसर पर राजदरबार में बुलाए जाने के कारण दीपावली नहीं मनाई और इसके एक महीने बाद भंडारी के वापिस लौटने पर अगहन के महीने में अमावस्या के दिन दीपावली मनाई गई।

ऐसा भी कहा जाता है कि किसी समय जौनसार-बावर क्षेत्र में सामूशाह नामक राक्षस का राज था जो बहुत निर्दयी तथा निरंकुश था। उसके अत्याचार से क्षेत्रीय जनता का जीना दूभर हो गया था। तब पूरे क्षेत्र की जनता ने अपने इष्ट महासू देवता से उसके आतंक से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। महासू देवता ने लोगों की करुण पुकार सुनकर सामूशाह का अंत किया। उसी खुशी में यह त्योहार मनाया जाता है।

शिव पुराण एवं लिंग पुराण की एक कथानुसार एक समय प्रजापति ब्रह्मा और सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु में श्रेष्ठता को लेकर आपस में द्वंद होने लगा और वे एकदूसरे के वध के लिए तैयार हो गए। इससे सभी देवी-देवता व्याकुल हो उठे और उन्होंने देवाधिदेव शिवजी से प्रार्थना की। शिवजी ने उनकी प्रार्थना सुनकर विवाद स्थल पर ज्योतिर्लिग [महाग्नि स्तंभ] के रूप में दोनों के बीच खड़े हो गए। उस समय आकाशवाणी हुई कि तुम दोनों में से जो इस ज्योर्तिलिंग के आदि-अंत का पता लगा लेगा, वही श्रेष्ठ होगा। ब्रह्माजी ऊपर की ओर उड़े और विष्णुजी नीचे की ओर। कई साल तक वे दोनों खोज करते रहे लेकिन अंत में जहां से खोज में निकले थे, वहीं पहुंच गए। तब दोनों देवताओं ने माना कि कोई हमसे भी श्रेष्ठ [बड़ा] है, जिस कारण दोनों उस ज्योर्तिमय स्तंभ को श्रेष्ठ मानने लगे।

यहां महाभारत में वर्णित पांडवों का विशेष प्रभाव है। कुछ लोगों का कहना है कि कार्तिक मास की अमावस्या के समय भीम कहीं युद्ध में बाहर गए थे, इस कारण वहां दीपावली नहीं मनाई गई, जब वह युद्ध जीतकर आया तो खुशी में ठीक एक महीने के बाद दीपावली मनाई गई और यही परंपरा बन गई।

कारण कुछ भी हो लेकिन यह दीपावली जिसे यहां नई दीपावली भी कहा जाता है, जौनसार-बावर के चार-पांच गांवों में मनाई जाती है। वह भी महासू देवता के मूल हनोल व अटाल के आस-पास। यहां एक परंपरा और है कि महासू देवता जो हमेशा भ्रमण पर रहते हैं तथा अपने निश्चित ग्रामीण ठिकानों में 10-12 सालों के बाद ही पहुंच पाते हैं, जिस गांव में महासू देवता विश्राम करेंगे। वहां उस साल नई दीपावली मनाई जाएगी, बाकी संपूर्ण क्षेत्र में बूढ़ी दीपावली ही मनाई जाएगी।

वैसे तो एक महीने बाद [मार्गशीर्ष] अमावस्या को मनाई जाने वाली दीपावली उत्तराखंड के कई क्षेत्रों, यहां से लगे टिहरी के जौनपुर ब्लाक, थौलधार, प्रतापनगर, उत्तरकाशी के रवांई, चमियाला, रूद्रप्रयाग तथा कुमाऊं के कई इलाकों में मनाई जाती है। अन्य जगहों में दीपावली मनाने के जो भी कारण हों, यहां बिल्कुल भिन्न हैं।

यहां की दीपावली में न पटाखों का शोर, न बिजली के बल्बों व लड़ियों की चकाचौंध, न ही मोमबत्तियों की जगमगाहट बल्कि बिल्कुल सामान्य तरीके से यहां आज भी दीपावली मनाई जाती है। यह त्यौहार वैसे तो अमावस्या से जुड़ा है पर इसकी शुरुआत चतुर्दशी की रात से ही हो जाती है। इस रात सारे गांव के लोग एक निश्चित जगह पर इकट्ठे होते हैं। वहां पर ब्याठे भीमल की छाल व उत्तरी डंडिया जलाकर पारंपरिक गीत गाते हैं जिन्हें हुलियत कहा जाता है। बाजगी [गांव में ढोल बजाने वाला] अपने घर में कई दिन पहले जौ बोकर हरियाली तैयार करता है, जिसे स्थानीय लोग दूब कहते हैं।

अमावस्या की रात को जिसे स्थानीय बोली में औंसा रात कहा जाता है। इस रात गांव के सभी नर-नारी व बच्चे-बूढ़े पंचों को आंगन में इकट्ठा कर अपना पारंपरिक लोक नृत्य करते हैं तथा लोकगीत के माध्यम से अपने इष्ट महासू देवता की आराधना करते हैं।

चतुर्दशी की भोर से प्रत्येक दिन चार बजे प्रात: जागकर अपने घर से ब्याठे जलाकर निश्चित स्थान पर पहुंचते हैं तथा उजाला होने तक नृत्य एवं गीतों का दौर चलता रहता है। दीपावली के अंतिम दिन हमेशा की भांति सुबह चार बजे सभी एकत्र होते हैं और उजाला होने पर अपने-अपने घरों को जाते हैं।

स्नान आदि से निवृत्त होकर सभी लोग एक जगह इकट्ठे होकर पूरे गांव में बधाई देने को निकलते हैं। पुरुष-महिला व बालक-बालिका सभी अलग-अलग समूहों में निकलते हैं।

इसी दिन यहां भिरूडी भी मनाया जाता है। इसमें हर परिवार से 108 दाने अखरोट के मांगे जाते हैं। ये सभी को देने होते हैं। जिनके घर में उस वर्ष लड़के का जन्म हुआ हो, वह 200 दाने देगा, ऐसा नियम है तथा उसका पालन भी होता है। यही दिन सर्वाधिक महत्व का होता है। दोपहर तीन बजे से ही लोग पंचों के आंगन में घिरने लगते हैं।

इसमें व्यवस्थानुसार बच्चे, औरतें, बूढ़ी महिलाएं तथा मर्द अलग रहते हैं। बूढ़ी महिलाओं को पहले ही उनका हिस्सा दिया जाता है। फिर अखरोटों की बरसात होती है और सभी लूटने के लिए उन पर टूट पड़ते हैं। चारों तरफ ऊंचे स्थानों से अखरोट फेंके जाते हैं। यह बेहद रोमांचकारी दृश्य होता है।

भिरूडी कार्यक्रम के बाद उसी स्थान पर बाजगी सभी लोगों के सिर में दूब लगाता है। इस क्रिया को हरिपाडी कहा जाता है। उसके पश्चात् नृत्य किया जाता है। बीच में दो तलवार बाज एकदूसरे पर प्रहार व बचाव करते हैं। यह इस समाज में युद्धप्रेमी होने की भावना को उजागर करता है। नृत्य में भी संघर्ष और बचाव यह साबित करता है कि यहां के लोग अपनी सुरक्षा के लिए सदैव संवेदनशील रहते हैं। अंधेरा होने के बाद सभी लोग ढोल के साथ नाचते हुए गांव के भ्रमण पर निकल पड़ते हैं। गांव के चारों ओर होते हुए फिर उसी जगह पर पहुंचते हैं। इसे यहां मौव कहा जाता है। यहां पहुंचते ही सभी परिवारों के बड़े भाई एक तरफ और छोटे भाई दूसरी तरफ खड़े होते हैं और उनमें रस्साकशी होती है, संघर्षपूर्ण वातावरण रहता है। फिर से नाच और गीतों का दौर चलता है। भोजन आदि के बाद फिर सभी एकत्र होते हैं और अब बारी आती है 20 फीट ऊंचे हाथी के नचाने की।

इस विशालकाय हाथी पर गांव का मुखिया सवार रहता है, जिसके दोनों हाथों में तलवारें होती है जिन्हें वह रणक्षेत्र की भांति घुमाता रहता है। हाथी को गांव के 10-12 हट्टे-कट्टे नौजवान कंधों पर उठाए इधर-उधर पूरे आंगन में नचाते रहते हैं। इनके थकने पर बीच-बीच में गांव के ही कलाकार हास्य नाटक पेश कर मनोरंजन करते हैं। पूरी रात नृत्य गीतों तथा संगीत को समर्पित रहती है जिसमें मुख्यत: इष्ट महासू देवता की आराधना वीर रस और श्रृंगार रस के गीत होते हैं। इनमें एक गीत के बोल कुछ इस प्रकार हैं:

वरमे ना जाई विरैसु वरमे जाअी रै।

सोडा तामी बहणो देया, तु विरस छेवे लाइया।।

पारंपरिक गीत में विरसू नामक महासू देवता का भंडारी यमुना नदी को पार करते समय बह जाता है, जिसे एक मछली निगल लेती है और वह मछली दिल्ली में एक मछुवारे द्वारा पकड़ी जाती है। वह उस मछली को एक व्यापारी को बेचता है लेकिन वह व्यापारी भी महासू देवता का भक्त था। हनोल स्थित मंदिर के लिए वह अनाज तथा नमक आदि भेजता था। उसकी संतानें आज भी इस परंपरा को निभाती हैं।

रातभर नृत्य के बाद आठ दिन से भिगोए धान से तैयार च्यूडा को प्रसाद के रूप में सभी एक-दूसरे को देते हैं। आधुनिक युग की फटाफट जिंदगी का असर यहां भी पड़ा है लेकिन फिर भी यहां अभी तक यह संस्कृति बची हुई है। नौकरी पेशा लोग इस दीपावली में आज भी सपरिवार घर पहुंच जाते हैं।

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नमस्कार बीनू भाई,
 
बीनू भाई कैसे रही आपकी दिवाली?