गढ़वाली लोक संस्कृति का लोहा मनवाने वाले चन्द्र सिंह राही आज भी आज भी अपने काम में जुटे हैं। प्रस्तुत हैं देहरादून में गढ़वाल सभा में इस संस्कृतिकर्मी से लक्ष्मण सिंह नेगी की छवीं बथ के अंश -
प्रश्न:- अपने निजी जीवन के बारे में कुछ बतायें।
उत्तर:- मेरा जन्म 1947 को गिवाली गाँव पौड़ी गढ़वाल में हुआ। मेरी पत्नी का नाम सुधा देवी है और मेरे चार लड़के एवं एक लड़की है।
प्रश्न:- संगीत की शिक्षा कैसे हुई ?
उत्तर:- मेरे पिताजी मूल रूप से घड़ियाल का काम किया करते थे। उनके साथ मैं थकुली, डमरू, हुड़की बजाया करता था। वही मेरी प्रथम पाठशाला थी जहाँ मैंने संगीत के स्वर सीखे।
प्रश्न:- आकाशवाणी के अनुभवों के बारे में बतायें।
उत्तर:- मेरे द्वारा सबसे पहला गाना आकाशवाणी केन्द्र दिल्ली में 1962 को फौजियों के लिये कार्यक्रम में ‘पार वीणा की’ से शुरूआत हुई। उस दिन मुझे बहुत अच्छा लगा। उस समय मेरी उम्र 15 वर्ष थी जबकि 17 वर्ष से नीचे के लोगों को गाने की अनुमति नहीं होती थी। 1972 में लखनऊ आकाशवाणी में रिकॉर्डिंग शुरू हुई। उस समय मेरे गाने मुख्य रूप से ‘हिलमा चांदी बटन, हिलमा तुमारी रटन’, ‘हिट बल्द सरासरी रे, तिल दै मां जाण रे’, इतना ही नहीं आकाशवाणी में सैकड़ों कार्यक्रमों की प्रस्तुति मेरे द्वारा दी गई।
प्रश्न:- अब तक कितने स्टेज कार्यक्रम दिये ?
उत्तर:- लखनऊ, मुम्बई, बरेली, नैनीताल, देहरादून, सहारनपुर सहित अब तक 1500 स्टेज कार्यक्रम प्रस्तुत किये हैं।
प्रश्न:- आपने लोकगीतों के संकलन और लेखन का कितना काम किया हैं ?
उत्तर:- मैंने आज तक दो हजार गीतों का संकलन तथा 550 गीत स्वयं के द्वारा लिखे हैं। वर्तमान में गढ़वाली गजलें लिख रहा हूँ। मेरा प्रसिद्ध लोक गीत ‘भाना हो रंगीला भाना दूर ऐजा बांज कटण, रूप की खजानी, सोली को धुरा घुर दगड्या, तिलै दारू बोला’ आदि गानों ने मुझे प्रसिद्धि दिलाई। मैंने फिल्म ‘चोरी-चोरी’ में भी काम किया। ‘रामछोल’ नामक एक किताब लिखी तथा 142 ऑडियो कैसेटों के लिये काम किया। डौर, थाली के स्वर, हुड़की, ढोल, दमाऊँ, वीणा, शहनाई के स्वरों व तालों को संकलन करने का काम किया है और स्वयं इन वाद्य यंत्रों को बजाना जानता हूँ।
मैंने जागर संस्था के साथ मिलकर 10 वर्षों तक नाटक, संगीत, डॉ. राजेन्द्र धस्माना के साथ मिलकर अर्द्ध ग्रामेश्वर, कफन नाटक में काम किया। गढ़ भारती संस्था के साथ लिखना, रचना करना सीखा। उत्तराखंड कला संगम के साथ मिलकर काम किया।
प्रश्न:- आपको संस्कृति के क्षेत्र में कौन-कौन से पुरस्कार व सम्मान मिले ?
उत्तर:- मुझे लोक संस्कृति के क्षेत्र में मोहन उप्रेती संस्कृति पुरस्कार, डॉ. शिवानन्द नौटियाल स्मृति पुरस्कार, 1995 में गढ़भारती गढ़वाल सभा के द्वारा सम्मान पत्र, मोनाल संस्था लखनऊ द्वारा सम्मान पत्र से सम्मानित किया गया।
प्रश्न:- उत्तराखंड की संस्कृति के बारे में आपकी क्या सोच है ?
उत्तर:- मेरा मानना है कि अन्य काम तो होते रहेंगे। मुख्य रूप से क्षेत्रीय भाषाओं, गढ़वाली, कुमाउँनी, जौनसारी, भोटिया आदि भाषाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिये। इसके साथ ही लोकगीत, लोक परम्परायें, लोक संगीत, लोक वाद्य यंत्रों पर काम अवश्य होना चाहिये।
प्रश्न:- सरकार किस तरह के काम कर रही है ? आपको किस तरह का सहयोग मिल रहा है ?
उत्तर:- मेरी दृष्टि में सरकार कुछ नहीं कर रही है। न ही कुछ करने की सोच रही है। पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूड़ी के कार्यकाल में कला, संस्कृति का काम निष्क्रिय व निराशाजनक रहा। अब आशा है कि क्योंकि डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ स्वयं एक लेखक एवं कवि हैं, अतः हो सकता है कि वे लोक संस्कृति के क्षेत्र में काम करें। मैं कला संस्कृति परिषद का पूर्व में सदस्य रहा हूँ। किन्तु उस समय भी संस्कृति के क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ। बल्कि राजनीति अधिक हुई। इस कला परिषद के उपाध्यक्ष स्वयं ही कुर्सी पर लिपटे रहे, कला संस्कृति का विकास नहीं हो पाया।
प्रश्न:- आपकी आजीविका का आधार क्या है ?
उत्तर:- मैंने बीस वर्षों तक संगीत के साथ-साथ टेलीफोन विभाग में छोटी सी नौकरी की। लोक संगीत की धुन ने बीस वर्ष के बाद नौकरी छुड़वा भी ली। मुझे 4,000 रुपया मासिक पेंशन मिल जाती है। दाल-रोटी का जुगाड़ पेंशन से हो जाता है।
प्रश्न:- उत्तराखंड में जिस तरह नदी घाटियों में बांध बन रहे हैं तो क्या लोक संस्कृति बच पायेगी ?
उत्तर:- वैसे तो उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना थी कि अपना राज होगा, अपनी बोली भाषा होगी। हम लोग अपने विकास का नियोजन करेंगे। किन्तु आज उल्टा हो गया। हमारे विकास के ठेकेदार कम्पनी, दलाल और नेता हो गये हैं। बाँधों से संस्कृति नहीं बच सकती है। हम लोगों को मिलकर संघर्ष करना चाहिये।