AuthorTopic: पहाड़ों से पलायन - गंभीर समस्या  (Read 721 times)

Offline नेगी दा

  • Regiment Commander
  • Lieutenant General
  • **
  • Posts: 4058
  • Karma: 235
  • Gender: Male
गांव के ईर्द गिर्द सिरहाने और पांवों की ओर दो तीन कीमी दूर तक छितरे उन सीढ़ीनुमा खेतों को दूर दूर तक निहारते हुए यह प्रश्न जेहन में बार-बार कौंधा कि आखिर इस महाविस्तार में इतने सीढीनुमा खेत किसने बनाये होंगे? अब ये खेत बंजर पडे़ हैं। हमारे शैशव में जिन खेतों पर फसलें लहलहाती थी वहां अब जंगली झाडियॉं और कंटीले पेड़ उग आये है। ऐसा देखना उस आमधारणा के उलट है जो मानती है कि पहले जनसंख्या बहुत कम थी और अब एकाएक विस्फोट की स्थिति में पहुंच गई हैं। फिर ये खेत ऑंखिर बंजर क्यों हो गये? जनसंख्या बढ़ने के साथ उन पर दबाव बढ़ना चाहिए था। पर ये दवाब शून्य ही नही बंजर कर दिये गये हैं। कभी कभी ठहरकर यदि आप नजर डालेंगे तो इस वितान में दूर खडे़ छोटे- छोटे मकानों को देखकर एहसास होगा ये किसी महासभ्यता के ध्वंशावशेष हैं। जो या तो अपनी किसी गलती से यहां छूट गये या इन्हें यकीन है कि इस विशाल उपत्यका में जल्दी ही कोई नई सभ्यता पनाह लेगी और वे वंदनवार सजाकर इस बंजर जमीन के पुर्ननवा होने का जश्न मनायेंगे.

रोजगार के लिए पहाड़ों से शहरों की ओर पलायन के 60 वर्षो का लेखा जोखा देखें तो इतना समझ में आता है कि इन वर्षो में अकेले उत्तराखण्ड की एक करोड़ से अधिक आबादी अन्यत्र चली गई और 85 लाख वहॉं रह गई। लेकिन इन आंकड़ों का स्याह पक्ष उत्तराखण्ड शासन की एक सूचना निदर्शिनी सामने रखती है। इस डायरी में संकलित एक डेटा बताता है उत्तराखण्ड में कुल 16826 गांव हैं। इनमें से आबाद ग्राम 15761 और 1065 गैर आबाद ग्राम हैं। यानि 1065 गांवों में आबादी नहीं है. सरकार भी मानती है कि वे खंडहर और बंजर हो गये हैं।

जो लोग महानगरों की आपाधापी रेलमपेल और कतार कल्चर से उकता गये हैं वे यकीनन यह मान सकते हैं कि शहरों में स्पेश का महाअभाव इन विरानों में नई सभ्यता का अभ्युदय कर सकता है। सुविधाओं की दौड़भाग में सुदंर न सही पहाड़ी कस्बों की ओर लोग दौड़ तो रहें हैं। रुद्रपुर, रामनगर, हल्द्वानी, पंतनगर जैसे सुविधासंपन्न कस्बों में पांच सात सालों में ही कई हजार खाते पीते महानगरों में बसे एन आर आईज अप्रवासी पहाडियों ने घर खरीदे हैं । अभी यह दौड थमी नही है । हाउसिंग कंपनियां आये दिन इन कस्बों में दूर दराज तक पैर पसार रही हैं । जिन खाते पीते अघाये लोगों को यह अहसास हो गया है कि दिल्ली जैसे महानगरों में निकट भविष्य में जीवन यापन और दुष्कर होने वाला है वे इन सुविधा संपन्न गिरि कंदराओं कि जडों में अपने आशियाने सुरक्षित कर रहे हैं ।

शिवालिक फुट हिल्स यानि मध्य हिमालय के गांव वीरान हो रहे हैं। इन्हें इस तरह से मानवीय पलायन ने विरान नही किया है। तपते हिमालय, सूखते वनों उजडते चारागाहों और जलश्रोतों के चलते यह स्थिती हुई है। कुछ लोग इसे उत्तराखंड के ग्रामीण जीवन में आये बडे परिवर्तन के रूप में परिभषित कर रहे हैं, लेकिन जो लोग अब तक पहाड के गांवों में बचे हैं वे हरीमिर्च और धनिया बाजार से लाने का दर्द जानते हैं । इस दर्द को महानगरों में रह रहे वे लोग भी बखुबी समझ सकते हैं जो महासंघर्ष के बाद सर छुपाने की जगह तो पा जाते हैं लेकिन घर में फूल के गमले की जगह का सपना देखते ही नही । पहाड में लोगों के पास छोटे- छोटे ही सही ढेर सारे खेत खलिहान हैं. गरम होते मौसम भूख से जंग में करो या मरो पर उतारु वाइल्ड लाइफ ने इंसान को यहां सब होते हुए भी बंचितों की जमात में खडा कर दिया है। यह तो ठीक से नही कहा जा सकता कि वास्तव में यह पहाडी जीवन में आया कोई परिवर्तन है जिसे स्वीकार करना ही होगा या मौसमी उठापटक है जो जल्द ही ठीक हो जायेगा, लेकिन बंजर होते पहाडी गांवों में बसे लोगों के चेहरे, गांवों की ओर पैर पसारी रही सडकों, मोबाइल और माल क्रांति की तेज बयार में गमगीन नही लगते।

संचार और सड़क जल्दी ही दुर्गम को सुगम भी बना देंगे। इसलिए पहाड़ के एक गांव में मुटठी भर रह गये लोग अभी बंजरों के बीच अकेले भले ही रह गये हों जल्दी ही उन्हें शहरों से खदेड़ दी गयी सभ्यताओं का अभिनंदन करना है। बाबजूद इसके कि वे श्रम और जमीन के होते हुए भी अपने लिए वह कुछ नही उगा सकते सिवाय उसके जो अपने आप उग जाता है। क्योंकि राम के साथी रहे जंगली जीव धार्मिक अभयदान के साथ-साथ भारतीय वन्य जीव कानूनों की छतरी में अबघ्य हैं । वाइल्ड लाइफ,पर्यावरण और धरती की ठेकेदारी कर रही बिरादरी को आबारा कुत्तों को सूखी रोटी खिलाना छोडकर कभी इस तरह की समस्याओं पर भी नजर डालनी चाहिए। ज्वाइंट फारेस्ट मैनेजमैंट जैसे जुमलों से बाहर निकलकर आदमी और जानवर के बीच बढ़ती खाई को कम करने की कोई व्यावहारिक तरकीब निकालनी चाहिए। यह पहाड़ या भारत के किसी एक गांव की समस्या नही वल्कि डैन्सफारेस्ट वाले हर राज्य के ग्रामीण की समस्या है। यह कैसी बिडंबना है कि पहाड़ के जिन गॉंवों में लोग एक दशक पूर्व लंगूर बंदर जैसे जंगली जानवरों के दर्शन करने 4-5 कि.मी. दूर घने जंगलों में जाते थे उनके घर बाग बगीचे खेत खालिहान बंदरों और अन्य जंगली जानवरों से गुलजार हैं। पहाड़ के पलायन ने उसके आधें खेत खलिहान बंजर किये थे और अब आधा काम जानवरों ने कर दिया है। गनीमत है कि इसके बावजूद भी कुछ लोग किसी तरह पहाड़ के गॉंवों में अटके हुए हैं। वे चाहे सरकारी योजनाओं के बूते कुछ दिन सुगम जीवन जीलें लेकिन पहाड़ी गॉवों को बंजर होने से बचाने का उनके पास कोई उपाय नही।

शायद ही किसी ने यह कल्पना की हो कि उत्तराखण्ड के किसी गॉंव की शत-प्रतिशत आबादी पलायन कर गई हो लेकिन पलायन का लेखा जोखा बताता है प्राकृतिक आपदाओं और विस्थापन के परे भी कई गॉव पलायन के चलते उजड़ गये हैं। पहाडों में पर्यावरणीय परिवर्तनों से नये खतरे खडे हुए हैं। जंगल के बेइंतहा दोहन से प्राकृतिक संसाधन समाप्ति की ओर अग्रसर हैं। परिणामस्वरूप जल संकट के साथ साथ भूखी और कुपित वन बिरादरी का रोष भी लोगों पर बढ़ रहा है। पहाडों से पलायन कर महानगरीय जीवन के घात-प्रतिघात सह रहे लोग शायद महानगरीय त्रासदियों के बीच यह अच्छी तरह समझ गये होंगे कि यहॉ जीवन अब कितनी सुगम है. निश्चय ही कालक्रम की प्रगति पर्यावरणीय नुकसानों के साथ-साथ नई तकनीक के सहारे अब दुर्गम पर्वतीय जनजीवन को काफी सुगम बना चुकी हैं। सड़कें और संचार के महाजंजाल से संवरता दुगर्म पहाड़ अब कई अर्थों में सुगम हो गया है। यह बात दीगर है कि इन सुविधाओं के बीच विरानों में नई सभ्यताओं का क्रंदन भी गूंजने लगी है. यदि समय रहते वे इस क्रंदन को सुन लें तो नई पीढ़ियॉं उनकी शुक्रगुजार हो सकती है। पलायन और संस्कृति के पतन के इस अध्याय में बचने-बचाने के सरकारी प्रयास नगण्य हैं। उत्तराखण्ड की सरकार पर्यावरणीय कानूनी छत्री के तले जानवरों की चिंता में मग्न है लेकिन दुर्गम क्षेत्रों में आम आदमी के जीवन को सुगम बनाने के प्रयास नगण्य हैं।

Tags: मेरी दिलचस ्पी




 
 
ह्वे गे झिग्जा पुतुडी

Offline नेगी दा

  • Regiment Commander
  • Lieutenant General
  • **
  • Posts: 4058
  • Karma: 235
  • Gender: Male
उत्तराखंड में ढहते मकान और जंङ लगे ताले। जी हां! सदियों से पहाड़ की यही कहानी और यही सच्चाई भी है। ये कहानी है-पलायन की। अपने विकास और खूबसूरत दुनियां को देखने की चाहत के ये विभिन्न अनचाहे रूप हैं। एक मकान केवल इसलिए खंडहर में बदला क्योंकि उसे संवारने के लिए घर में पैसा नहीं था और एक मकान में ताले पर इसलिए जंङ लगा है कि वहां से अपनी प्रगति की इच्छा लिए पलायन हो चुका है। इनमें कोई इसलिए अपने पुश्तैनी घर नहीं लौटे क्योंकि वे बहुत आगे निकल चुके हैं और सब कुछ तो यहां खंडहरों में बदल चुका है। इनमें कई तालों और खंडहरों का संबंध तो राष्ट्राध्यक्ष, राजनयिकों, सेनापति, नौकरशाहों, लेखकों, राजनीतिज्ञों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों और लोक कलाकारों का इतिहास बयान करता है जब‌कि अधिसंख्य खंडहर उत्तराखंड की गरीबी-भुखमरी, बेरोजगारी-लाचारी और प्राकृतिक आपदाओं की कहानी कहते हैं।
पलायन और पहाड़ का सम्बन्ध कोई नया नही है। स‌दियों से लोग देश के विभन्न भागों से बूर शासकों के दमन से बचने अथवा तीर्थयात्रा के उद्देश्‍य से पहाड़ों की तरफ आये, और यहीं के होकर रह गये। इनमें मुख्यतः द‌क्षिण भारत और महाराष्ट्र के ब्राह्मण तथा राजस्‍थान के ठाकुर थे ‌‌जिन्‍होने तत्कालीन राजाओं ने योग्यतानुसार उ‌चित सम्मान ‌दिया और अपनी राज व्यवस्‍था का महत्‍वपूर्ण अंग बनाया।
वतर्मान समय में पलायन का यह प्रवाह उल्टा हो गया है। जनसंख्या बढ़ने से प्राकृ‌तिक संसाधनों पर बढते बोझ, कमरतोड मेहनत के बावजूद नाममात्र की फसल का उत्पादन तथा कुटीर उद्योगों की जजर्र ‌‌‌स्‍थि‌ति के कारण युवाओं को पहाड़ों से बाहर ‌निकलने को मजबूर होना पड़ा। उन्‍नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में पहाड़ों में अंग्रेजों के आने के बाद इस क्षेत्र के युवाओं का सैन्य सेवाओं के ‌लिए पहाड़ से बाहर निकलना प्रारम्भ हुआ। पहाड़ों का ज‌टिल जीवन, क‌ठिन भौगो‌लिक परिस्‍थितयों में रहने का अभ्यास, मजबूत कद-काठी, सीधे सरल, ईमानदार व शौर्यवीर पहाड़ी पुरुष अपनी कायर्कुशलता व अदम्य साहस के कारण देश-‌विदेश में युद्धक्षेत्र में अपना लोहा मनवाने लगे।
‌बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में शिक्षा के प्र‌ति जागरुकता के फलस्‍वरूप युवाओं का उच्च शिक्षा के ‌लिए मैदानी क्षेत्रों की तरफ आना प्रारम्भ हुआ। यही समय था जब पहाड़ से बाहर सैन्य सेवाओं के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी रोजगार करने लगे. कई लोगों ने सा‌हित्‍य, कला व राजनी‌ति में अच्छा नाम कमाया। स्‍वतन्त्रता के बाद पहाड़ों में धीरे-धीरे कुछ ‌विकास हुआ। शहरों-कस्‍बों में धीरे-धीरे उच्च शिक्षा के केन्द्र ‌विक‌सित हुए। ग्रामीण, इलाकों में शिक्षा के प्र‌ति लोगों का रूझान बढने लगा। ‌पिछले कुछ सालों में तकनीकी शिक्षा शिक्षण के भी कुछ संस्‍थान खुले। उद्योगो की शून्यता तथा सरकारी नौकिरयों की घटती संख्या के कारण वतर्मान समय में भी पहाड़ में शिक्षत युवाओं के पास मैदानों की तरफ आने के अलावा कोई ‌विकल्प नही है।
पहाड़ के गांवों से होने वाले पलायन का एक पहलू और है। वह है कम सुगम गांवों तथा कस्‍बों से बड़े शहरों अथवा पहाड़ों की तलहटी पर बसे हल्द्वानी, कोटद्वार, देहरादनू, रुद्रपुर तथा ह‌रिद्वार जैसे शहरों को होता बेतहाशा पलायन। मैदानी इलाकों में रहकर रोजगार करने वाले लोग सेवा‌निवृत्‍ति के बाद भी अपने गांवों में दुबारा वापस जाने से ज्यादा ‌किसी शहर में ही रहना ज्यादा पसन्द करते हैं।‌स्‍थि‌ति ‌जितनी गम्भीर बाहर से ‌दिखती है असल में उससे कहीं अधिक ‌चिंताजनक है। जो गांव शहरों से 4-5 ‌किलोमीटर या अधिक दूरी पर हैं उनमें से अधिकांश खाली होने की कगार पर हैं। सांकल तथा कुण्डों पर पडे हुए ताले जंङ खा रहे हैं और अपने ‌बा‌‌‌‌शिन्‍दों के इन्तजार में खण्डहर बनते जा रहे दजर्नों घरों वाले सैकडों मकान, पहाड़ के हर इलाके में हैं। द्वार-‌किवाड, चाख और आंगन के पटाल जजर्र हो चुके हैं। काली पाथरों (स्‍लेटों) से बनी पाख (छत) धराशायी हो चुकी हैं।
उत्तराखण्ड राज्य ‌निमार्ण के बाद बनी ‌किसी भी सरकार ने इस गम्भीर समस्‍या के समाधान के ‌लिये ईमानदार पहल नहीं की। अ‌पितु मैदानी इलाकों को तेजी से ‌विकिसत करने की सरकारी नी‌‌ति से असन्तु‌लित ‌विकास की स्‍थि‌ति पैदा हो गयी है। ‌जिससे पहाड़ से मैदान की तरफ होने वाले पलायन को बढावा ही ‌मिलेगा। क्या उत्तराखण्ड की सरकार पहाड़ों के पारंपिरक उद्योगों के पुनरुत्थान के ‌लिए भी प्रयास करेगी? पयर्टन उद्योग तथा गैरसरकारी संस्‍थानों के द्वारा सरकार पहाड़ों के ‌विकास के ‌लिए योजनाएं चला रही है, उससे पहाडी लोगों को कम मैदान के पूंजीपितयों को ही ज्यादा लाभ ‌मिल रहा है।
राष्‍ट्रीय स्‍तर पर ‌जिस "ब्रैन ड्रैन" को रोकने के ‌लिए सरकार हाथ पांव मार रही है, जरूरत है ‌कि उत्तराखण्ड की सरकार भी देश और ‌विदेशों में काम कर रहे ‌‌प्रतिभावान लोगों को उत्तराखण्ड के ‌विकास से जोडने की पहल करे. ले‌किन हम लोग जो वातानुकू‌लित कमरों में बैठ कर लैपटॉप-कम्प्यूटर में इंटरनेट पर ये लेख पढ़ रहे हैं, क्या पहाड़ वापस जाने की सोच सकते हैं? या ‌‌‌‌केवल सरकार को कोस कर और इस मुद्दे पर बयानबाजी करके ही इस समस्‍या का पुख्ता समाधान ‌मिल जायेगा?

ह्वे गे झिग्जा पुतुडी

Offline नेगी दा

  • Regiment Commander
  • Lieutenant General
  • **
  • Posts: 4058
  • Karma: 235
  • Gender: Male
पहाड़ से पलायन"


"पहाड़ से पलायन"

थम नहीं रहा है सिलसिला,
जिसने पैदा कर दिया है,
पहाड़ पर सूनापन,
जिसकी शुरुआत हो चुकी थी,
भारत की आज़ादी से पहले,
उत्तराखण्ड की नदियों में,
बहते निर्मल नीर की तरह.

कभी परदेश से,
पलायन करते हुए,
पहाड़ पहुँचते थे,
प्रवासी पहाड़ियों के पत्र,
मेहनतानें का मन्याडर,
माता पिता के पास,
जिनकी नजर लगि रहती थी,
गाँव में आए डाकिये पर,
और रहती थी आस.

जब पहाड़ पर जीवन,
पहाड़ सा कठोर था,
तब मीलों पैदल चलकर,
आते जाते थे गाँव,
लेकिन,
आज क्यों ठहर गया सिलसिला?
यादों में बसकर.

जिनको आज भी,
प्रवास में रहते हुए,
पहाड़ के प्रति है प्यार,
जिन्होंने सुना, पहाड़ पर,
घुघती का गीत,
घाटियों में गूंजता शैल संगीत,
हिल्वांस की सुरीली आवाज,
बांसुरी पर बजती,
बेडू पाको बारमासा की धुन,
जिन्होंने देखा पहाड़ पर,
ऋतु बसंत, फ्योंली अर् बुरांश,
पंच बद्री, पंच केदार, पंच प्रयाग,
देवभूमि में चार धाम,
ले लो लौटने का संकल्प,
जन्मभूमि की गोद में,
चाहे, एक पर्यटक की तरह,
पलायन की पीड़ा से दूर.

Copyright @ जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसू"

« Last Edit: February 09, 2010, 09:47:07 AM by "गढ़वाल सम्राट" पंवार विपिन चंद्र पाल सिंह »
ह्वे गे झिग्जा पुतुडी

Offline नेगी दा

  • Regiment Commander
  • Lieutenant General
  • **
  • Posts: 4058
  • Karma: 235
  • Gender: Male
उत्तराखंड में पूरे भारत का एक आदर्श राज्य बनने की प्रचुर संभावनाएं हैं। केवल शर्त यह है कि यहां के शाशक (मंत्री और अफ़सर), विधायक और नियोजक तथा उद्यमी लोग लिये गये संकल्पों पर अमल करें। पहला संकल्प यह था और अब भी है कि उत्तराखंड राज्य-निर्माण की तार्किकता और तक़ाज़ों को अमली जामा पहनाने का काम राज्य स्थापना के तुरंत बाद शुरू कर दिया जाना चाहिये था, जो नहीं हुआ। याद होगा कि सभी हिमालयी पर्वतीय क्षेत्रों के अनुरूप उत्तराखंड की विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण उत्तर प्रदेश के मध्य हिमालयी गढ़वाल-कुमाऊं के पर्वतीयजनों ने भी १९५० के वर्षों में राज्य पुनर्गठन आयोग के समक्ष अपने लिए पुरज़ोर मांग की थी कि हमें पृथक राज्य का दर्जा दिया जाये अथवा प्रस्तावित हिमाचल प्रदेश के साथ जोड़ दिया जाये। आयोग के एक सदस्य श्री केएम पणिक्कर ने अपनी टिप्पणी में इस मांग का अनुमोदन भी किया था, किंतु हिमाचल प्रदेश बन गया, उत्तराखंड रह गया। क्यों ऐसा हुआ, यह एक लंबी कहानी है।
बहरहाल हिमाचल प्रदेश बना और पहले मुख्य मंत्री यशवंत सिंह परमार पहले दिन से ही पर्वतीय राज्य के तक़ाज़ों को साकार करने के काम में जुट गये। आज हिमाचल प्रदेश देश का अग्रणी राज्य है। यह इसलिए संभव हुआ कि राज्य निर्माण के तर्क और तक़ाज़ों को नये राज्य की हर गतिविधि का केंद्रबिंदु बनाकर हर कार्य किया गया। उत्तराखंड के संदर्भ में क्या थे मुख्य मुद्दे?
१. पहाड़ी जल, ज़मीन, जन और जलवायु इन चार खंभों पर नये राज्य का कामकाज किया जाये, जो ज़्यादातर मैदानी उत्तर प्रदेश से भिन्न हैं।
२. उपरोक्त चार अपेक्षाओं के अनुकूल आयोजन किया जाये, जिसकी शुरुआत श्री हेमवतीनंदन बहुगुणा के उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्रित्व-काल में १९७४-१९७५ में ही राज्य स्तर पर पृथक पर्वतीय नियोजन विभाग बनाकर कर दी गयी थी और जिसे बहुप्रतीक्षित राज्य बन जाने के बाद और भी उपादेय बनाया जाना था।
३. नये राज्य की नयी राजधानी के लिए गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों के मध्यवर्ती स्थल गैरसैंण को पृथक राज्य आंदोलन ने चुना था, जो न सिऱ्फ भावनात्मक दृष्टि से बल्कि रोज़गारोन्मुख विकास और जनोन्मुख प्रशासन की दृष्टि से भी एक शानदार उपलब्धि होता। यह अंगरेजों के बाद बनाया गया देश का एक अत्यंत सुरम्य हिल स्टेशन साबित होता।
४. पर्वतीय प्रदेश उत्तराखंड के अपेक्षित निर्माण को साकार करने में ऐसे अनुकूल मानव तत्व का होना आवश्यक है जो उपरोक्त लक्ष्यों के प्रति समर्पित हो। इनमें सबसे महत्वपूर्ण रोल प्रशासन का रहता है।
ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में पिछले नौ बरसों में कुछ हुआ ही नहीं है। प्रदेश के मैदानी भागों में बड़ी पूंजी के बड़े कारखाने टैक्स माफी का लाभ उठा कर लगाये गये हैं। पनबिजली योजनाएं पूरी हुई हैं और ज़ारी हैं, लेकिन इनसे पलायन नहीं रुका, विस्थापन बढ़ा; जबकि ऐसी किसी भी योजना से पहाड़ी जनजीवन सरल और सुखी होना चाहिये था, विकास का मुख्य लाभ बड़े उद्योगपतियों को हुआ। ये उद्योगपति ऊपर पहाड़ों पर कामधंधे लगाने नहीं आये। लिहाज़ा पहाड़ों से पलायन ज़ारी रहा; और जो जीवन की कठिन परिस्थितियों के कारण बाहर गये थे उनके चाहते हुए भी लौटने का सवाल ही नहीं पैदा होना था, क्योंकि उनको आकर्षित करने की न तो कोई योजना पेश की गयी और अगर कोई खुद से आ भी गया तो उसे शासकीय गलियारों में थकाकर भगा दिया गया।
इस तरह उत्तराखंड में जल का तो दोहन हो रहा है, लेकिन पहाड़ों पर न वह सिंचाई, पेयजल की आपूर्ति कर रहा है और विकसित पर्यटन-तीर्थाटन के अभाव में न बिजली वहां कोई फायदा पहुंचा रही है। जहां-जहां भी निर्माण-कार्य हुआ है वहां उजाड़ बना दिया गया है। सड़क हों या बांध और उनसे बनी झीलें वहां सौंदर्यीकरण का कहीं नामोनिशान नहीं।
उत्तराखंड की अपनी नैसर्गिक प्राकृतिक छटा है तथा अनेक पौराणिक तीर्थों को समेटे हुए यह हिमालयी भूभाग देवभूमि कहलाता है। यहां तीर्थाटन तथा पर्यटन बहुआयामी उद्योग बन सकता है। फलोत्पादन, जड़ी-बूटियां और सुगंधी पादप, यहां की विशिष्ट वनोपज, विनष्ट वनों का नव-वनीकरण और इनसे जुड़े कामधंधे इस नये प्रदेश को संसार का सबसे धनी प्रदेश बना सकते हैं, जो समूचे भारत की समृद्धि में बहुत बड़ा योगदान कर सकता है, किंतु इस काम में राज्य शासन-प्रशासन तथा केंद्रीय वन विभाग का सहयोग-सुविधा का मिलना ज़रूरी है।
फिर भी निजी तौर पर यदि कुछ उद्यमी आगे आयें और निजी भूमि पर जड़ीबूटी, फलफूल, मशरूम उगायें और सहयोग के आधार पर मार्केटिंग करें तो उत्तराखंड के २००००० (दो लाख) परिवारों को दस साल में १८ हज़ार करोड़ रुपये का मुनाफा वितरित किया जा सकता है। इतना ही मुनाफ़ा राज्य सरकार को हो सकता है। (इस लेखक ने इस बारे में एक कानसेप्ट पेपर माननीय तत्कालीन मुख्य मंत्री द्वय श्री नारायण दत्त तिवारीजी तथा मा. मे.जन. भुवनचंद्र खंडूड़ीजी को दिया था। दोनों ने उस पर आगे विचार के लिए अपने अफसरों को सौंपा था। अफसरशाही ने उसका वही हश्र किया जो वे हर सकारत्मक काम का करते हैं।) देश-विदेश में बैठे प्रतिभाशाली उत्तराखंडी कई ऐसे प्रस्ताव दे चुके हैं, उन पर काम हो तो उत्तराखंड एशिया का स्विट्ज़रलैंड, धरती पर दूसरा स्वर्ग, पुन: आराध्य देवभूमि बन सकता है। उत्तराखंड आंदोलन का मूल उद्देश्य हम अपना घर वापसी का सपना साकार कर सकते हैं।
आयोजन, प्रबंधन, तकनीकी और वित्त-व्यवस्थापन के क्षेत्र में आज अनेक ज्ञानवान उत्तराखंड के उद्यमी और विशेषज्ञ मौजूद हैं। समृद्ध उत्तराखंड के निर्माण में हर उत्तराखंडी कैसे सहभागी बने, इस प्रश्न पर हम सभी को विचारमंथन करना है।
ह्वे गे झिग्जा पुतुडी

Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"

  • Brigadier
  • *
  • Posts: 514
  • Karma: 72
  • Gender: Male
  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
"पहाड़ से पलायन" पर क्या लिखूं....नेगी दा ये मेरी स्वरचित कविता पोर्टल पर पराई होकर सब कुछ कह रही है....फर्क इतना है किसी सज्जन ने मेरा नाम मिटाकर अपना लिख दिया है.

"zigyansu"
कितनी सुन्दर देव-भूमि, देखूं उड़कर आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं,जाकर बिल्कुल पास से...रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

Offline राजू भट्ट

  • Lieutenant General
  • *
  • Posts: 2415
  • Karma: 47
  • लात भुलेंद पर बात नि भुलेंद
लेखक के इतिहास, समाज-शास्त्र, अर्थ-शास्त्र, लोकतंत्र, प्रशासन, औद्योगीकरण,  कृषि-विज्ञानं के अतृप्त एवम कुंठित ज्ञान  को देखते हुए सरकारी अफसरों ने  ऐसे कांसेप्ट  पेपर को रद्दी की टोकरी में ही डालना था, कोई नोबेल पुरस्कार की संस्तुति थोड़ी न करनी थी|

(इस लेखक ने इस बारे में एक कानसेप्ट पेपर माननीय तत्कालीन मुख्य मंत्री द्वय श्री नारायण दत्त तिवारीजी तथा मा. मे.जन. भुवनचंद्र खंडूड़ीजी को दिया था। दोनों ने उस पर आगे विचार के लिए अपने अफसरों को सौंपा था। अफसरशाही ने उसका वही हश्र किया जो वे हर सकारत्मक काम का करते हैं।)

« Last Edit: February 08, 2010, 08:15:42 PM by राजू भट्ट »
पैली गढदेश  त्वीकु नमस्कार च
तेरी हम पर दयादृष्टि अपार च
तेरी छाया माँ हमकु बडी  मोज च
वीर पुत्रू की तेरी खडी  फौज च

Offline धनेश कोठारी

  • Major
  • *
  • Posts: 150
  • Karma: 16
  • Gender: Male
  • मुट्ठियां भींचो मगर, मुट्ठियों में लावा भरकर, मुट्ठियों को तान दो।
        उत्तराखण्ड राज्य निर्माण का एक कारण पलायन भी था। पहाड़ों से पलायन दैवीय परिस्थितियों के कारण यदि हुआ भी तो वह सुरक्षित स्थानों की ओर हुआ। न कि सीधे मैदानों की तरफ। महत्वपूर्ण रहा रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा जैसी मौलिक सुविधाओं का अभाव। ऐसा भी नहीं कि आजादी से अब तक इस हलके में तरक्की के कदम बिलकुल नहीं बढ़े। विकास हुआ किंतु द्वारा अदा किये गये राजस्व से काफी कम। यह भी कतई न माने कि पहाड़ों में रोजगार नहीं, हां, सरकारी रोजगार की हमारी अपेक्षायें अवश्य पूरी नहीं हुई हैं। मगर स्वरोजगार के लिए यहां पर्याप्त स्पेस कल भी था और आज भी है। क्योंकि हमने अपने बुढ़े पुरानों से बतकही के दौरान कई बार सुना कि आजादी से पहले व बाद में देश के कई अन्य हिस्सों से ‘लालाओं’ ने पहाड़ों में आसरा लिया और तब जीवनयापन तक के लिए मोहताज इन लोगों ने मेहनतों की बदौलत अपनी आर्थिकी को सुदृढ़ किया। आज यही लोग पहाड़ों में सबसे बड़े ‘सौकार’ हैं। इनमें ऐसा क्या था जो हममें नहीं। वह थी लगन, धैर्य और चालाकी।
        निश्चित ही अब तक की तमाम सरकारों ने हमें वाजिब हक आज भी नहीं दिया है। लेकिन आज सरकारों में बैठे हुए किसके लोग हैं! यदि वे हमारे हितों की अनदेखी कर रहे हैं तो हम उन्हें गद्‍दी सौंप रहे हैं! दोष किसका है! आपका उपरोक्त आलेखों में लिखा था कि- वातानुकू‌लित कमरों में बैठ कर लैपटॉप-कम्प्यूटर में इंटरनेट पर ये लेख पढ़ रहे हैं, क्या पहाड़ वापस जाने की सोच सकते हैं? एक विचारणीय प्रश्न है।
        अभी हाल में यहां एक अखबार में प्रकाशित हुआ कि लोग वापस लौटने लगे हैं। हालांकि यह पुरी कवायद राज्य के द्वारा ‘मैनेज’ की गई प्रतीत हुई। क्योंकि वास्तविक आंकड़ों में यहां पलायन राज्य निर्माण के बाद ज्यादा हुआ है। इस तथ्य के एवज में मैं यहां ‘धाद’ द्वारा प्रकाशित इस वर्ष के कैलेण्डर का फोटो भी लेख के साथ लगा रहा हूं।
दोस्तों मैं स्वयं बीते १५ वर्षों से सुदूर हिमालय बदरीनाथ में रोजगार कर रहा हूं। मुझे दो दशक पहले ‘लालाओं’ की कहानियों ने पहाड़ों में रोजगार तलाशने को प्रेरित किया था।
        यहां मैं नहीं कहूंगा कि आज बीस लाख से अधिक प्रवासियों को अपना सब कुछ दांव पर लगाकर वापस लौट आना चाहिए। लेकिन संभावनायें तलाशें ऐसी गुजारिश अवश्य ही करना चाहूंगा।
« Last Edit: February 09, 2010, 12:49:02 AM by धनेश कोठारी »
जैकि अपणि बोली नि भाषा नि समझा वेकि ब्वै अर बुबा नि_जीवानन्द श्रीयाल

Offline नेगी दा

  • Regiment Commander
  • Lieutenant General
  • **
  • Posts: 4058
  • Karma: 235
  • Gender: Male
"पहाड़ से पलायन" पर क्या लिखूं....नेगी दा ये मेरी स्वरचित कविता पोर्टल पर पराई होकर सब कुछ कह रही है....फर्क इतना है किसी सज्जन ने मेरा नाम मिटाकर अपना लिख दिया है.

"zigyansu"



Thanks for inforamtion about the poem..., bahut sunder poem hai... job bahut kuchh bayan karti hai...., sabki soch aap jainsi ho jaye to is samasya se kuchh raahat mil jaye
ह्वे गे झिग्जा पुतुडी

Offline "गढ़वाल सम्राट" पंवार विपिन चंद्र पाल सिंह

  • Core Team
  • Lieutenant General
  • *
  • Posts: 3689
  • Karma: 185
  • Gender: Male
  • ये दिल है बड़ा ही दीवाना; छेड़ा न करो इस पागल को
Quote
"पहाड़ से पलायन" पर क्या लिखूं....नेगी दा ये मेरी स्वरचित कविता पोर्टल पर पराई होकर सब कुछ कह रही है....फर्क इतना है किसी सज्जन ने मेरा नाम मिटाकर अपना लिख दिया है.

"zigyansu"
quote]

Sir chori karne wala kabhi na kabhi pakdaa jata hai....chalo koe nahin ab likin yahan borad se koe bhi article copy nahin ho saktaa. ab yahan kuch change ho gaya hai..


------------
"मातृभूमि, मातृसंस्कृति और मातृभाषा। यह तीन देवियां हैं, इनका सम्मान करना चाहिए। इनही से ही संसार में सम्मान मिलता है।"
---------
मेरा पागलपन :
उत्तराखंडी ई-पत्रिका: http://e-magazineofuttarakhand.blogspot.com/

Offline राजू भट्ट

  • Lieutenant General
  • *
  • Posts: 2415
  • Karma: 47
  • लात भुलेंद पर बात नि भुलेंद
जगमोहन जी पहले तो यह देख कर बुरा लगा कि किसी ने आपकी रचना पर अपना नाम चिपका दिया पर अब लगता है कि आपको तो बधाई देनी चाहिए| जगमोहन जी कलम उठा कर शब्दों से तो बहुत से लोग खेल लेते है पर जब किसी  कवि की रचनाये चोरी होने लगती है इसका अर्थ यह होता है कि कविता में शब्दों के अस्थिपिंजर के साथ साथ आत्मा भी प्रविष्ट हो चुकी है|  जीवित कविताये ही चोरी होती है| 

"पहाड़ से पलायन" पर क्या लिखूं....नेगी दा ये मेरी स्वरचित कविता पोर्टल पर पराई होकर सब कुछ कह रही है....फर्क इतना है किसी सज्जन ने मेरा नाम मिटाकर अपना लिख दिया है.

"zigyansu"


पैली गढदेश  त्वीकु नमस्कार च
तेरी हम पर दयादृष्टि अपार च
तेरी छाया माँ हमकु बडी  मोज च
वीर पुत्रू की तेरी खडी  फौज च