AuthorTopic: Kanu Uttarakhand Chayenu Chaa ????  (Read 6195 times)

Offline juhi

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Re: Kanu Uttarakhand Chayenu Chaa ????
« Reply #45 on: January 19, 2009, 05:11:53 PM »
I think we should focus more on the development of cottage industries.This could include establishing low-budget training organizations/centres for sewing,painting,pickle making,mehendi art etc.
Maybe we can have volunteers for giving these trainings.
Its just a crude idea at the moment still,it would benefit basically the women because they can do this part-time also and at their homes only and would make them independent and self-employed!!

Offline vivekpatwal

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उत्तराखंड के सवा दो लाख घरों में ताले !!!!!!!!!!!!

एक छोटी सी खबर हिन्दुस्तान में छपी थी कि सरकार के सर्वेक्षण में यह पता चला कि उत्तराखंड के पर्वतीय इलाके में दो लाख से अधिक घरों में ताले लटके हुए है। इन घरों के लोग रोजी रोटी की तलाश में अपने गांवों से निकलकर या तो महानगरों में चले गए है या जिला मुख्यालयों में आ गए है। इतनी सी खबर व्यवस्था के चेहरे से नकाब उठा देती है। इतने सारे लोग एक दिन में तो गए नहीं होंगे। यह पलायन लगातार जारी रहा होगा। कभी किसी को इस पर सोचने का विचार भी नहीं आया। देश की आजादी किसी भी क्षेत्र के लिए खुशहाली लाई हो लेकिन उत्तराखंड में तो यह पलायन ही लेकर आई। दो लाख से ज्यादा घरों के सरकार की साठ साल की नीतियों का नतीजा हैं। लोगों का राज्य बनने के बाद देहरादून में बैठे सत्ताधारियों के लिए ये चुनौती भी है कि क्या अब इन घरों के ताले खुल पाएंगे या इनमें लगतार बढ़ोत्तरी होती चली जाएगी। ये ताले आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक चुनौतियां है। सरकार ने सर्वेक्षण तो करवा दिया अब इलाज क्या होगा। सामाजिक तौर पर देखा जाए तो यह शासन व्यवस्थापकों के आंतरिक उपनिवेश की कहानी है। जिसमें देश के कुछ हिस्सों को जानबूझकर आर्थिक रुप से पिछड़ा बनाया जाता है ताकि वहां से सस्ता श्रम और माल मिलता रहे। सत्ताधारियों की नजर में ये सिर्फ मतदाता और करदाता हैं। अलबत्ता नई अर्थव्यवस्था में ये उपभोक्ता भी बन गए हैं।

इन घरों में कभी मनुष्यों की वह प्रजाति रहती थी, जिसका अपने परिवेश, आबोहवा और संसाधनों से खून का रिश्ता था। इसलिए इन्हें मारकर मौज काटने की बर्बरता उनमें नहीं थी। लेकिन ये घर आगे ऐसे भी नहीं रहेंगे। प्राकृतिक संसाधनों को `कमाऊ माल´ समझने वाली शक्तियां टिड्डीदल की तरह इन पर काबिज हो जाएंगी। संभव है इन घरों को छोड़ाने वालों के ही कुछ वंशज टिडि्डयों तब्दील हो जाएं। कई तो हो भी चुके हैं, तभी तो पहाड़ की हवा में आज उनकी गंध को आप कहीं भी महसूस कर सकते हैं। इनमें कुछ चुनावी पंख लगा कर उड़ते हैं तो कुछ ने अपने पांव में दलाली के चक्के फिट कर लिए हैं। पहाड़ों को प्यार करने वाले पता नहीं कैसे अपने धार-ओलारों से ही बिखुड़ गए!
Vivek Patwal
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Offline vivekpatwal

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उत्तराखंड में सम्पदा ही बनी विपदा

जब पर्वतीय क्षेत्र कटे-कटे थे, आवागमन व संचार की दुरुहता थी तो स्थानीय संसाधनों पर निर्भरता ही आर्थिक विकास का पैमाना थी। इससे देशज ज्ञान भी पनपता था पर आज किसी भी क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के संदर्भ पूर्ववत नहीं रहे हैं। सभी क्षेत्रों में बदलाव आ रहे हैं। परिवेश, पर्यावरण, इच्छाओं, जरूरतों और नैतिक मूल्यों में तथा विज्ञान व तकनीकी की क्षमताओं में भारी बदलाव आए हैं।

अत: अब आर्थिक आत्मनिर्भरता की बहस भी बदले परिवेश में की जानी है। आर्थिक आत्मनिर्भरता पाने की खोज व इच्छा मनुष्य में अनंत काल से विद्यमान रही है। कोई देश या व्यक्ति यह नहीं चाहेगा कि उसे किसी के सामने हाथ फैलाना पड़े। इससे उसके अपने हित में निर्णयों को लेने की स्वतंत्रता पर असर पड़ता है। यह उन संस्कृतियों के लिए तो बहुत ही विवशताभरी स्थितियां हैं जो अपनी अलग पहचान बनाना चाहती हैं।

उदाहरण के लिए उत्तराखंड आंदोलन के दौरान उत्तराखंडी पहचान बनाना भी राज्य पाने की लड़ाई का एक मकसद था। ऐसी उग्र इच्छाओं के बीच जब खाने, बोलने, सुनने, पहनने का ही संकट हो तो कम से कम पहचान की बात करने वाले पूरे देश में फैले समूहों को आर्थिक आत्मनिर्भरता की बात गंभीरता से करनी होगी।

अधिकांशत: ऐसे समूह अब तक पहुंच के बाहर रहे हैं और तथाकथित विकास की मुख्य धारा से भी दूर रहकर प्राकृतिक संसाधन के प्रचुर क्षेत्रों में ही स्थापित रहने की कोशिश कर रहे हैं।

किंतु योजनाकारों ने अधिकांश ऐसे क्षेत्रों को उन स्थितियों में पहुंचा दिया है जहां उनकी कार्यप्रणाली व वित्त आधारित सोच ने भी परियोजना आधारित विकास को मॉडल मानते हुए अपने क्षेत्रीय जल, जमीन, जंगल, खेती को बचाने व बढ़ाने के लिए भी बाहर के धन की आवश्यकता प्रतिपादित कर दी है। नि:संदेह जंगल, जल, जमीन जिसमें खनिज व जैविक संपदा भी हैं, विकास की मूलभूत पूंजी रही है।

अब तक क्षेत्रीय निवासी उसी के आधार पर अपने आर्थिक विकास की बात सोचते थे किंतु अब वे उनमें कमी आती देख रहे हैं। अत: जब मूल पूंजी में ही कमी होने लग जाए, तो फिर ऐसा आर्थिक विकास जो उसी पूंजी पर आधारित है, वह भी प्रभावित होगा।

श्रम भी पूंजी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। परंतु जब रोजगार के साधन ही सीमित हों, श्रम को कहीं मौका ही न मिले व उचित मूल्य भी न मिले तो उपरोक्त आधारों पर आर्थिक आत्मनिर्भरता नहीं पाई जा सकती।

संपूर्ण हिमालयी उत्तराखंड क्षेत्र में भूगर्भीय हलचलें जारी हैं। हिमालय अभी भी अपना संतुलन बना रहा है। भूस्खलन, भूकंप व जलस्रोतों में परिवर्तन मानवजनित कारणों से ही नहीं पर्यावरणीय कारणों से भी हो सकते हैं। ऐसे में विकास की परियोजनाओं के लिए यहां की विशिष्टताओं एवं संवेदनाओं को देखते हुए विशेष पर्वतीय तकनीक की भी आवश्यकता है।

सड़कें जो आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण घटक मानी गई हैं, के लिए तो पहाड़ों में पर्वतीय जोखिम अभियांत्रिकी का उपयोग शुरू हो गया है। पर्वतीय क्षेत्रों में आर्थिक विकास के लिए वैकल्पिक ऊर्जा व परिवहन की आवश्यकता है।

इससे एक लाभ यह भी होगा कि पर्यावरण और विकास के जिस द्वन्द्व में ये क्षेत्र फंसे हैं, उनसे बाहर निकल सकेंगे। सवाल यही उठता है कि प्रासंगिक विज्ञान व तकनीक से अनुसंधान व विकास के लिए उत्तराखंड व ऐसे ही अन्य पिछड़े क्षेत्रों में धन कहां से आएगा?

यदि आर्थिक विकास के दौरान ही इन क्षेत्रों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इनकी प्राकृतिक संपदा ही विपदा बन जाएगी। जमीन ही ढहते हुए भूस्खलनों के साथ घरों को तबाह कर देगी। कटते, जलते जंगल ही मौसम में परिवर्तन ले आएंगे। जल, जंगल और जमीन का ऐसा संबंध विकसित करना होगा कि इन क्षेत्रों में आपदाएं न आएं।

आपदा प्रबंधन, वैश्विक स्तर पर भी संवेदनशील क्षेत्रों में एक आवश्यक विधा मानी जा रही है। कई बार हम समझते हैं कि हम विकास को कार्यान्वित कर रहे हैं किंतु प्रत्युत्तर में इससे विनाश हो जाता है और खेती, जल स्रोतों से, वनों से, मवेशियों व शरीर से पूरी उत्पादकता प्राप्त नहीं हो पाती है।

इसका परिणाम यह होता है कि आर्थिक विकास का भयावह व अमानवीय चेहरा भी उभर आता है। पूरे विश्व में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब आर्थिक विकास तो होता है किंतु रोजगार व अन्य मानवोचित सेवाओं में गिरावट आती है।

इसी के साथ प्रजातंत्र व आर्थिक आत्मनिर्भरता के संबंधों पर विशेष ध्यान देना होगा। खासकर ग्रामीण पिछड़े क्षेत्रों और पंचायती राज के अंतर्गत जहां उन्हें विकेन्द्रित नियोजित अनुशासित विकास को स्वयं के ही संसाधनों को जुटाकर या बढ़ाकर करने की न केवल सीख भी दी जाती है बल्कि उनसे इसकी अपेक्षा भी की जाती है।

पिछड़े व पहाड़ी क्षेत्रों में पंचायतों के पास ग्राम सभाओं में ही आय बढ़ाने के साधन, चुनावी प्रजातांत्रिक विवशताओं के बीच लोकप्रिय नहीं हुए। अत: आर्थिक आत्मनिर्भरता के आयाम में पंचायती राज की मजबूती के लिए यह जरूरी है कि जगह-जगह संसाधन विकास केंद्र भी स्थापित हों।

जब बाजार की बात आती है तो आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए यह भी जरूरी है कि राज्यों के पिछड़े क्षेत्रों के उत्पादों की खपत का बाजार हमेशा बाहर ही न ढूंढा जाए बल्कि इन क्षेत्रों के भीतर भी इन्हें बनाया जाए। इससे बाहरी अस्थिरता कम प्रभावित करेगी।

स्थानीय आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाते समय स्थानीयजनों के मनोविज्ञान, परंपरा व परिवेश का भी स्वाभाविक ध्यान रखना होगा।

मार्टिन लूथर किंग के ये शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं कि 'सारी प्रगति बहुत ही संवेदनशील संतुलन में रहती है और एक समस्या का निदान हमें दूसरी समस्या से सामना करवा देता है।' फलस्वरूप इलाज मर्ज से ज्यादा खराब हो जाता है। आर्थिक विकास या आर्थिक आत्मनिर्भरता पाने के उपायों को इन्हीं संदर्भो में भी देखना होगा।

आर्थिक आत्मनिर्भरता के कुछ प्रतीक भी चुनौती के रूप में स्वीकार करने होंगे। जैसी आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी ने चरखा का प्रतीक लिया था। अत: यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि आर्थिक विकास हम किन आधारों व किन संसाधनों व किस वातावरण में कर रहे हैं।

जैसे स्थाई सतत विकास की बात की जाती है, वैसे ही आर्थिक आत्मनिर्भरता क्षणिक नहीं होनी चाहिए। घर जलाकर रोशनी करना अंधकार से लड़ने का बेहतर तरीका नहीं है।

पिछड़े क्षेत्रों में आर्थिक आत्मनिर्भरता पाने के लिए कई तरह के उद्योगों की बात की जाती है। संबंधित क्षेत्रों में ऐसे प्रतिमानों के आदर्श स्थापित करने की जरूरत है जिन्हें क्षेत्रीय जन वास्तव में स्वीकार कर सकें।

अत: खर्चो पर नियंत्रण आवश्यक है। महंगे तरीकों से आर्थिक आत्मनिर्भरता पाने की बहुत ज्यादा संभावनाएं नहीं हैं।

पूंजी को लेकर कई सवाल उठते हैं। जैसे यह पिछड़े क्षेत्रों में कैसे आएगी? ज्यादा पूंजी कैसे पैदा होगी? प्राकृतिक संसाधनों की भरपाई कैसे होगी व उनका बेकार जाना कैसे कम होगा और वह किस प्रकार नागरिकता के मूल्यों को मजबूती प्रदान करेगी? यही वे मजबूत प्रश्न हैं जिनका उत्तर खोजना क्षेत्रीय आत्मनिर्भर आर्थिक विकास के लिए अत्यंत जरूरी है।
Vivek Patwal
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Offline Prashant Rawat

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Re: Kanu Uttarakhand Chayenu Chaa ????
« Reply #48 on: December 23, 2009, 01:52:48 PM »
मै हर दिन दोस्ती का दिन मनाना चाहता हूं.. हर दोस्त को उसका हक यानि मेरा याराना देना चाहता हूं. चाहे दूर हो पास लेकिन हर भाव के साथ उसके साथ रहना चाहता हूं....

Offline Prashant Rawat

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Re: Kanu Uttarakhand Chayenu Chaa ????
« Reply #49 on: December 23, 2009, 01:53:39 PM »
मै हर दिन दोस्ती का दिन मनाना चाहता हूं.. हर दोस्त को उसका हक यानि मेरा याराना देना चाहता हूं. चाहे दूर हो पास लेकिन हर भाव के साथ उसके साथ रहना चाहता हूं....

Offline Prashant Rawat

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Re: Kanu Uttarakhand Chayenu Chaa ????
« Reply #50 on: December 23, 2009, 01:58:18 PM »
We want

ek jut
मै हर दिन दोस्ती का दिन मनाना चाहता हूं.. हर दोस्त को उसका हक यानि मेरा याराना देना चाहता हूं. चाहे दूर हो पास लेकिन हर भाव के साथ उसके साथ रहना चाहता हूं....

Offline sandeepkandwal_85

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Re: Kanu Uttarakhand Chayenu Chaa ????
« Reply #51 on: July 17, 2010, 10:38:14 PM »
I thnk tourism and more industry in uttrakhand plain will develpo uttarakhand