-------जिंदगी------
रफ्ता-रफ्ता कट रही है जिंदगी,
जी रहा हूँ घट रही है जिंदगी .
अफरा-तफरी के इस भंवर में,
नफरतों में बंट रही जिंदगी .
मौत का बाज़ार है हर तरफ,
आंसुओं में धुल रही है जिंदगी .
क्यों खौफ खा के बैठे है तू ,
जरा उधर तो देखो क्या मचल रही है जिंदगी .
बंद इन आँखों को ज़रा तू खोल,
किस तरह फिसल रही है जिंदगी .
मौत के इन सौदागरों से बोल,
कि पीछा तेरा भी कर रही है जिंदगी .
जी सके ना ओ चैन से कभी,
हर तरफ नजर आए उसे जिंदगी .
हम तो लाल हैं उस भारत मा के,
जिसकी तिरंगे के तरह लहरा रही है जिंदगी .
बस एक बार तो आके देखो इस "रतन" के करीब,
कब हमारी नट-खट रही है जिंदगी .
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