AuthorTopic: गढ़वाल राइफल्स के कीर्तिस्तम्भ एवं बहादुर सेनानी— वी.सी. दरबान सिंह नेगी  (Read 813 times)

Offline "गढ़वाल सम्राट" पंवार विपिन चंद्र पाल सिंह

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भारत का इतिहास उत्तराखंड के वीरों के अनुपम शौर्य एवं गौरवशाली सैनिक परम्पराओं तथा बलिदान की गाथाओं से भरा पड़ा है। विपरीत परिस्तिथियों में संघर्ष करने की शक्ति गढ़वालियों की विशेषता रही है। इन बहादुर सैनिकों में भी श्री दरबान सिंह नेगी ने संघर्ष करते हुए प्रथम पंक्ति में ख्याति अर्जित की है। इन्हें प्रथम विश्व युद्ध में अपनी अभूतपूर्व बहादुरी एवं शौर्य प्रदर्शित करने के उपलक्ष्य में ‘विक्टोरिया क्रास’पदक से सम्मानित एवं अलंकृत किया गया था।

जिला चमोली गढ़वाल के कड़ाकोट(नारायण बगड़ क्षेत्र) के अंतर्गत ग्राम कफारतीर में दिसम्बर १८८१ में पिता कमल सिंह के घर जन्मे दरबान सिंह नेगी बहुत कम शिक्षा प्राप्त कर मार्च १९०२ में लगभग २१ वर्ष की आयु में लैन्सडाउन जाकर फौज में भर्ती हो गये। प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व १९११ में लैंसनायक तथा १९१४ में नायक बनाये गये। इसके बाद दरबान सिंह अपनी १@३९वीं गढ़वाल राइफल्स बटालियन के साथ शीघ्र फ्रांस की रणभूमि में पंहुच गये।

प्रथम विश्व युद्ध में फ्रांस के फोस्टवर्ट के समीप खाइयों के भीतर २५ दिन तक लगातार कठिन परिश्रम के पश्चात २३ नवम्बर १९१४ को आपकी टोली छुट्टी मिलने पर आराम करने के लिये अपने शिविर लौट रही थी कि वे फिर बुलाये गये। जर्मनी की पल्टन ने अंग्रेजों की एक महत्वपूर्ण खाई के कुछ भाग पर दखल कर दिया था और उन्हें खदेड़ने की चेष्टा व्यर्थ हो गयी। तत्काल नायक दरबान सिंह की दोनों टोलियां पुन: बुलाई गयी। पहली टोली ने धावा किया और दूसरी टोली सहायता के लिये पीछे रही। धावा के समय संगीनों की मार मारते हुए आप व आपके साथी टेढ़ी–मेढ़ी खाइयों के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में‚ दूसरे से तीसरे में‚ तीसरे से चौथे में‚ इसी भांति अन्त तक आगे बढ़ते गये और साथ ही शत्रुओं की लाशें भी जमीन पर बिछाते चले गये। वे जर्मनी के बम के गोलों की बौछार में आगे बढ़ते रहे‚ घायल होकर भी नहीं रुके। अर्द्धरात्रि के बाद प्रात: चार बजते–बजते ३०० गज लम्बी खाई जर्मनों के चंगुल से निकाल ली गई। न मालूम उस वक्त कितने जर्मन मारे गये। १०५ जर्मन कैद किये गये। तीन तोपें‚ बहुत सी बन्दूकें और सामग्री भी हाथ लगी।

यह सब इस वीर गढ़वाली बहादुर एवं साहसी सेनानी दरबान सिंह के पराक्रम का परिणाम था। यदि वीर दरबान सिंह इतनी निर्भयता एवं आत्मविश्वास से अपनी टोली के आगे नहीं रहते तो इनके पक्ष की बहुत क्षति होती और वह खाई भी शत्रुओं के हाथ से नहीं छीनी जा सकती थी।

इस असाधारण बहादुरी प्रदर्शित करने के ११ वें दिन इन्हें सेना का सर्वोच्च पुरस्कार‚ विकट वीरत्व सूचक पदक ‘विक्टोरिया क्रास’प्रदान किये जाने की घोषणा की गयी और इन्हें शीघ्र हवलदार तथा कुछ समय बाद सूबेदार बना दिया गया। कुछ दिन बाद दिसम्बर १९१४ को स्वयं जार्ज पंचम ने अपने हाथों से लंदन के एक समारोह में बहादुर दरबान सिंह नेगी को ‘विक्टोरिया क्रास’पदक पहनाकर सम्मानित किया गया। इस सम्मान से भारतीय सेनाओं और विशेषकर गढ़वाली सैनिकों में एक नया उत्साह पैदा हो गया। गढ़वाल गौरवान्वित हुआ और सर्वत्र हर्ष की लहर फैल गयी। इस प्रथम महायुद्ध में इस पदक को प्राप्त करने वाले केवल १० भारतीय थे जिनमें दो गढ़वाली वीर थे। प्रथम दरबान सिंह नेगी और दूसरे गब्बर सिंह नेगी को यह पदक मरणोपरान्त प्रदान किया गया था।
प्रथम विश्व युद्ध से लौटने के बाद दरबान सिंह नेगी फौज में देश–विदेश में और भी सम्मान प्राप्त कर सेवारत रहे और सन् १९२३ में अवकाश प्राप्त कर पेंशन पर घर आ गये। मृदुभाषी श्री दरबान सिंह नेगी सर्वत्र वीसी साहब कहकर पुकारे जाते रहे और लोकप्रियता अर्जित करते रहे।

गढ़वाल के वीरवर दरबान सिंह नेगी वी.सी. आदि अनेक बहादुर भूतपूर्व सैनिकों से भेंट करने‚ उन्हें प्रोत्साहित करने एवं गढ़वाल का आभार प्रदर्शित करने हेतु सन् १९३५ के ग्रीष्मकाल में तत्कालीन वायसराय लार्ड विलिंग्डन की धर्म पत्नी लेडी विलिंग्डन गौचर में पधारी थी। उस सुअवसर पर गढ़वाल की जनता तथा यहां के बहादुर सेनानियों ने उनका अभूतपूर्व स्वागत किया था।

देश व गढ़वाल का मस्तक ऊंचा करने वाला यह बहादुर सेनानी अपना यशस्वी जीवन व्यतीत करता हुआ २४ जून‚ १९५० को लगभग ७० वर्ष की आयु में चिरनिद्रा में सो गया।

गढ़वाल राइफल्स के कीर्ति स्तम्भ एवं बहादुर सेनानी दरबान सिंह नेगी वी.सी. गौरवपूर्ण गाथा भावी पीढ़ी को भी प्रेरित और प्रोत्साहित करती रहेगी।

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"मातृभूमि, मातृसंस्कृति और मातृभाषा। यह तीन देवियां हैं, इनका सम्मान करना चाहिए। इनही से ही संसार में सम्मान मिलता है।"
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देहरादून। भारत-पाकिस्तान के बीच 38 साल पहले हुई जंग भले ही इतिहास के पन्नों में खो गयी हो, लेकिन सैनिक बहुल उत्तराखंड में इस जंग के किस्से आज भी गर्व से सुने और सुनाये जाते हैं। गढ़वाल राइफल्स और कुमाऊं रेजिमेंट की करीब डेढ़ दर्जन बटालियनों ने 1971 के इस युद्ध में हिस्सा लेकर दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिये थे। सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल डा. मोहन चंद भंडारी युद्ध की यादें ताजा करते हुए बताते हैं वे तब मेजर थे और पश्चिमी सीमा के छम्ब सेक्टर में तैनात सातवीं गढ़वाल राइफल्स की एक कंपनी को कमान कर रहे थे। गढ़वाल राइफल्स की 10 बटालियों ने इस युद्ध में भाग लिया, जिसमें 74 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। जनरल भंडारी गर्व से बताते हैं वैसे तो विभिन्न देशों के बीच में लड़ाइयां होती रही हैं, लेकिन इस लड़ाई का परिणाम ऐसा था, जिसने दुनिया का भूगोल ही बदल दिया था। एक नये राष्ट्र को जन्म दिया था। जनरल भंडारी के अनुसार यह लड़ाई एक और मायने में अलग थी। विश्वयुद्ध के बाद यह ऐसी अकेली लड़ाई थी, जिसमें दुश्मन के 93000 सैनिकों को युद्धबंदी बनाया गया था। इस युद्ध की यादें उत्तराखंड के बहादुर योद्धाओं के जेहन में तो हैं ही, इसके अवशेष भी यहां हैं। भारतीय सैन्य अकादमी के संग्रहालय में रखी पाकिस्तानी जनरल एके नियाजी की वह पिस्टल भी आज भी जैटेलमैन कैडे्टस को इस महान विजय की याद दिलाकर नया जोश भर देती है। पूर्वी कमान के आर्मी कमांडर ले. जन. जगजीत सिंह अरोड़ा के नेतृत्व में नियाजी को अपने 93 हजार सैनिकों के आत्मसमर्पण करने को बाध्य होने की एक विशाल ऐतिहासिक तस्वीर भी अकादमी के संग्रहालय में लगी है। गढ़वाल राइफल्स की दूसरी, पांचवीं और 11वीं बटालियन ने पूर्वी सेक्टर में नियाजी की सेनाओं से मोर्चा लिया जबकि पहली, तीसरी, चौथी, छठी, सातवीं, आठवीं व दसवीं बटालियन ने पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान को धूल चटायी। रेजिमेंट की नौवीं बटालियन नेफा में चीन सीमा पर तैनात रही। युद्ध शुरू होने के दूसरे दिन ही पांचवीं गढ़वाल राइफल्स ने बांग्लादेश के हिली नामक स्थान पर दुश्मनों के जो छक्के छुड़ाये वह इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। इस अदम्य वीरता के लिए बटालियन को हिली डे बैटिल आनर से सम्मानित किया गया। आज भी पांचवीं गढ़वाल राइफल्स इस दिन की कहानी को रोमांचक तरीके से दोहराती है। हालांकि बांग्लादेश में शेख मुजीबुर्रहमान की आवामी लीग पार्टी की जीत के बाद ही पाकिस्तानी सेना ने वहां 25 मार्च 1971 से कत्लेआम कर दिया था, लेकिन 3 दिसंबर को पाकिस्तान द्वारा पश्चिमी सीमा पर हवाई अड्डों पर बमबारी शुरू कर दी। उसके अगले ही दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने युद्ध की घोषणा कर दी। ऐसे में यह युद्ध मात्र 14 दिन तक चला और भारतीय सेना ने पाकिस्तान को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया। इस युद्ध में भारत 2998 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए जबकि पाकिस्तान को 12455 सैनिक गंवाने पड़े। भारत के घायल सैनिकों की संख्या 7986 थी जबकि पाकिस्तान के 20347 सैनिक घायल हुए।

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वीर जवानों को समर्पित ताऊ पहेली

४० फीट ऊँचा, तवांग घाटी की ओर देखता हुआ स्मारक सन १९६२ में भारत -चीन की लड़ाई में शहीद हुए वीर जवानों की याद में १९९९ में बनवाया गया है. [विस्तृत जानकारी साप्ताहिक पत्रिका में पढीये]


पूर्वी कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल एच.आर.एस.कलकत ने यह स्मारक ,देश को समर्पित करते हुए कहा १९६२ में २४२० भारतीय जांबाज़ सैनिकों ने ३१ दिन तक इस स्थान पर चीनी सैनिकों के हमलों का जवाब देते हुये, देश की रक्षा करते हुए अपने जीवन का बलिदान दिया. उन्होंने बताया -विपरीत परिस्थितियों में जीरो से नीचे तापमान में सूती यूनीफोर्म और सिर्फ ५० राउंड की पुरानी बंदूकों के साथ ही इन जवानों ने यह लडाई लड़ी.

जहाँ एक आम इंसान के लिए इतनी ठण्ड में सूती कपडों में रहने की सोचना भी मुश्किल है!



गढ़वाल राइफल के बहादुर जवान जसवंत सिंह रावत, १०,००० फीट पर, अकेले ३ दिन तक, चीनी सेना को जवाब देते रहे थे. उन्हीं के नाम से यहीं पास में एक कस्बे का जसवंत गढ़ नाम रखा है. उनकी वीरता से चीनी कमांडर इतना प्रभवित हुआ था की उनके कटे सर को ब्रास के तमगे के साथ ससम्मान भारत लौटा दिया था. कहते हैं आज भी जसवंत सिंह की आत्मा वहां रहती है, सालों से रोजाना उनके लिए सेना के जवान खाना बनाते हैं, यूनीफोर्म इस्त्री कर के रखे जाते हैं. उन सभी शहीदों को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि.


तवांग वार स्मारक के आधार में लिखा है-'How can man die better than facing fearful odds, for the ashes of his father and the temples of his Gods."


आपके सहयोग के लिये मैं आपका आभार प्रकट करते हुये हमारे वरिष्ठ संपादक और सभी के चहेते श्री समीरलाल जी “ समीर” से आग्रह करुंगी की वे आयें और आज के ताऊश्री सम्मान के विजेता की घोषणा के साथ साथ ही अन्य विजेताओं के नामों की भी घोषणा करें.



 
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