AuthorTopic: Awesome Uttarakhand !!  (Read 38321 times)

Offline "गढ़वाल सम्राट" पंवार विपिन चंद्र पाल सिंह

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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #795 on: December 22, 2009, 12:38:07 PM »
जागर तो हमारी थाती है :बसंती बिष्ट

उत्तराखंड की एकमात्र जागर गायिका बसंती बिष्ट का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। अपनी गायिकी से देश विदेश में जागर को समृद्ध कर चुकी हैं। पिछले दिनों जब टीवी पत्रकार जगमोहन आजाद गढ़वाल में थे तो उन्हें बसंती बिष्ट से मिलने को सौभाग्य प्राप्त हुआ। बसंती बिष्ट ने तब उनके गायन से लेकर मौजूदा माहौल तक विस्तार से बातचीत की। उसी बातचीत के कुछ अंश :-
 
बसंती जी, कब से गा रही हैं आप जागर ?
 
बचपन से ही, मां अक्सर गाती थी। उनके आज भी याद है राजा जात यात्रा, नंदा देवी यात्रा के दौरान गाने वाला गाना (यह गीत पिंडर घाटी में गायी जाती है)। जब मैं मां को जागर गाते सुनती थी, तो मेरे मन में अजीब सी चुलबुलाहट होती थी। ऐसा लगता था मानो जागर मेरे कंठ में कहीं छुपे हैं। मुझे लगता था मुझे इसे बाहर लाना चाहिए और जब मैं जागर गाती थी तो ऐसा लगता था मानों साक्षात् देवता-गण मेरे सम्मुख बैठे हैं, नृत्य कर रहे हैं। मैं निहाल हो उठती थी।
 
पिंडर घाटी की बात आपने सुनी हैं। स्थानीय लोगों ने वहां की लोक-संस्कृति को संजोकर रखा है। आप भी वहीं से हैं, कुछ विस्तार से बताइये ?
 
बिलकुल सही। मैं भी चाहती हूं कि नयी पीढ़ि अपनी सभ्यता-संस्कृति के बारे में विस्तार से जाने। लोग जानें कि आखिर जागर है क्या। आपने पिंडर घाटी की चर्चा की, पिंडर घाटी की संस्कृति-सभ्यता को गढ़वालियों ने हमेशा ही नकारा है जबकि मैं गर्व से कहना चाहती हूं कि इसी घाटी से पूरे उत्तराखंड में लोक-संस्कृति की विकास यात्रा शुरू हुई। आपको पुरानी बात बताती हूं। उन दिनों हमारे गांव में एक छप्पर के नीचे स्कूल चलता था। हम चार बहनें हैं। हम लोगों को घर का सारा काम करना पड़ता था। पढ़ाई के साथ-साथ घर का काम। इसी तरह पांचवीं तक पढ़ाई की। तब हमें वजीफा भी मिलता था। इसलिए पढ़ाई खूब करते थे, लेकिन पंद्रह साल की उम्र में मेरी शादी हो गई, तब लड़कियों की शादी जल्दी हो जाती थी। लेकिन शादी से पहले में जागर के बारे में बहुत कुछ सीख चुकी थी।   
 
मसलन –
 
मुझे कई गाथाएं कंठस्थ याद थीं। मां के साथ गाते-गाते कई जागर याद कर लिये थे। यहां तक कि डौंर-थाली और ढोल-दमाऊ बजाना सीख लिया था। सच कहूं, जागर गाने से मुझे जितनी खुशी होती है, मैं उसे बयान नहीं कर सकती। हमारी पिंडर घाटी में ऐसी-ऐसी लोक गाथाएं मौजूद हैं जिनके बारे में कोई नहीं जानता है। मैंने देखा है दूर-दूर से लोग आकर इन गाथाओं को सुनते थे, इन लोक-गाथाओं को अपने साथ लेकर जाते थे। लेकिन यह घाटी का दुर्भाग्य है कि इसके बावजूद किसी ने इनके संरक्षण के बारे में नहीं सोचा, किसी ने यह चुनौती स्वीकार नहीं की।
 
लड़की होते हुए भी आपने जागर की परंपरा को जीवित रखने की कोशिश की, सफल भी रहीं, आपके सामने भी तो कई चुनौतियां रही होंगी ?   
 
निश्चित तौर पर, लोगों ने मेरे माता-पिता से कहा कि क्यों लड़की को बर्बाद कर रहे हैं। तरह-तरह की बातें सामने आने लगीं। लेकिन पिताजी ने मुझे पूरा सहयोग किया, प्रोत्साहित करते रहे, बताते रहे कि किन-किन गाथाओं को गाना चाहिए, कौन-कौन सी ताल हैं जिनका प्रयोग किया जाना चाहिए और कौन-कौन सी ताल पर देवता प्रकट होते हैं। शादी हुई, पति श्री रणजीत सिंह जी फौज में थे। इस शैली को बढ़ाने में उन्होंने ने भी उत्साह बढ़ाया। गांव से बाहर आने के बाद भी मैं इस क्षेत्र से लगातार जुड़ी रही। बाद में मैंने शास्त्रीय संगीत(गायन)  ‘ प्राचीन कला केंद्र, चंडीगढ़ ’ से संगीत की शिक्षा ली। आकाशवाणी और दूरदर्शन के साथ-साथ मैंने देश-विदेश में जागर गाये। अब लोग सुनते हैं तो तारीफ करते हैं, एक समय था जब लोग कहते थे – लड़की को गवैय्या बना दिया। लेकिन मुझे लोकगाथाओं में रमना था, मैं रम गई।
 
कौन-कौन से प्रमुख जागर हैं जिन्हें गाना पसंद है?
 
जागर तो सभी गा लेती हूं, लेकिन नंदा जी का संपूर्ण इतिहास, मैना जी नंदा जी की मां और गुरौलाजी के गीत, आछरी, गौलू नर्सिंग और जो भी हमारे स्थानीय जागर हैं, उन्हें गाती हूं। इसके लिए वाद्य यंत्र भी खुद ही बजाती हूं। कोई दूसरा मेरे गानों के साथ वाद्य बजाता है, तो मैं ताल नहीं मिला पाती जो हमारे जागरों की मूल ताल है। जहां ताल और जागर का मेल नहीं होता, वहां मैं सिर्फ गाकर ही लोगों को सुना देती हूं।
 
आज के दौर में जागर शैली को कितना प्रासंगिक मानती हैं?
 
दौर कोई सा भी, लोक शैली या गाथाएं ऐसी हैं कि आपको उन पर विश्वास करना ही होगा। आप चाहे जितना मॉडर्न हो जायें, यह हमारे परिवेश में, जन-जीवन में किसी-न-किसी रूप में जीवित हैं। मैं जब मंच पर जाती हूं, गाती हूं, तो लोग गौर से सुनते हैं, इसका क्या मतलब हुआ। हां, बदलते वक्त के साथ यह, जागर गायन थोड़ा क्लासिकल हो गया है। 
 
क्लासिकल से आपका मतलब?
 
आज जिसे री-मिक्स कहते हैं। लोगों ने इसकी लय-ताल बदल दी है। जागर मूल रूप में वही गाते हैं जो पहाड़ों में रहते हैं। मैं इस बात का विशेष ध्यान रखती हूं कि जागर की भाषा मेरी है, बोली मेरी है, उसमें कोई गाने वाला नहीं है। इसलिए जब मैं गाती हूं तो इस बात का भी खयाल रखती हूं कि वाद्य खुद बजाऊं।
 
तो आज के परिवेश से कैसे बिठाती हैं तालमेल?
 
यह सवाल कई बार खुद मेरे सामने खड़ा होता है। ऐसे में एक ही ऊपाय मुझे सूझता है। जब कोई मुझे गायन के लिए बुलाता है तो मैं साफ-साफ कह देती हूं, कि वाद्य खुद ही बजाऊंगी। तब मेरी वेश-भूषा भी वैसी ही होती है। एक घटना आपको बताना चाहूंगी। बात सन् 1995-96 की है। अखिल गढ़वाल सबा के अध्यक्ष स्व. श्री वीर ठाकुर जी ने मेरे लिए सास तौर पर कार्यक्रम आयोजित किया था। जब मैं अपनी वेश-भूषा में गाने पहुंची और जागर गाना शुरू किया तो वहां मौजूद तमाम श्रोता झूम उठे। तब मुझे लगा कि वास्ताव में अपने पहनावे और इस जागर शैली का कितना महत्व है। लेकिन, फिर भी वह चीज सामने नहीं आ पा रही है, जो मूल है। 
 
यानी जो लोग आजकल जागर गा रहे हैं, उनमें कामियां हैं?
 
ठीक कह रहे हैं आप। बहुत कमियां हैं। कुछ लोगों के चलते इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आज जब लोग जागर कराते हैं, तो उसमें ऐसा कुछ भी नहीं होता, जो हमारे लोक से जुड़ा हुआ हो। जब हमारे समय पूजा होती थी, तो सबसे पहले देवता को न्योता जाता था। पुजारी लोग कई दिनों तक भक्ति करते थे, साधना करते थे। पूरे गांव में देवता की डोली घूमती थी, पेड़-पौधे, फसल-औजारों की पूजा होती थी। लेकिन अब लोग पहले शराब ढूंढ़ते हैं, फिर पूजा में बैठते हैं। इससे पूजा सफल होगी, मुझे ऐसा नहीं लगता। आज कुछ लोगों ने तो जागर का मतलब ही बदल दिया है। जागर को री-मिक्स बना दिया है। यह दुखद है कि कुछ लोग जागर के पुराने जानकारों के जागरों को अपने नाम से लिखने लगे हैं, गाने लगे हैं। कहने का मतलब, पहले पुरखों की इस थाति को संरक्षित करो, और अगर संरक्षित नहीं कर सकते तो कम-से-कम उसका मजाक मत उड़ाओ।   
 
संरक्षण की बात की आपने, इस अनमोल धरोहर को कैसे बचाया जा सकता हैं ?
 
जागर हो, छोलीया, झुमैलो, चौफले हो या फिर ऋतु गीत, सबसे भयंकर परिवर्तन आये हैं। इनका मूल स्वरूप अब धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। हमारी परंपराएं खत्म हो रही हैं। शुद्ध और सरल चीजों को दूषित किया जा रहा है। इसलिए संरक्षण जरूरी है। मैंने इस मामले में कभी समझौता नहीं किया। जहां भी गाती हूं, मूल जागर ही जाती हूं, पुराने वेश-भूषे के साथ। अगर मैं अपनी शैली छोड़ दूंगी, तो वह जागर नहीं रह जायेगी, गीत बन जाएगा और मैं इसके मूल स्वरूप को नहीं बदलना चाहती हूं। ऐसा सभी को करना चाहिए।
 
बसंती जी, आप बार-बार मूल रूप की बात कर रही हैं, आखिर इस जागर शैली का मूल रूप था क्या ?
मैं मूल स्वरूप या रूप पर बार-बार इसलिए जोर दे रही हूं कि आज इस शैली में जो भी बदलाव किये जा रहे हैं, वह कम-से-कम जागर तो नहीं है। गीत है। इनकी शैली अलग है, तथ्य अलग हैं, गाने का तरीका अलग है, घटनाएं अलग हैं, तो फिर यह जागर कैसे हुआ। सिर्फ आधुनिक वाद्य यंत्रों पर डौंर-थाली और ढोल-दमाऊ बजाने से कोई जागर नहीं बन जाता है। असली तो वह होता है जो ताल-लाय-छंद के बारे में जानता हो, जिसे मालूम हो कि डौर-थाली-ढोल-दमाऊ की ताल पर कैसे देवताओं को प्रकट किया जाता है। जब वह गाता है, तो उसके आसपास देवताओं का वास होता है। मैं भी जब जागर गाती हूं तो मुझे भी लगता है जैसे मेरे पास जो लोग जागर सुन रहे हैं, वह सब देवता बैठे हैं, मुझे उनसे अनोखी ऊर्जा मिलती है, मैं देवलोक में खो जाती हूं। मेरे लिए यह सिर्फ जागर नहीं, यह तो हमारी थाती है, थाती, जिसके बिना मैं एक पल रह नहीं सकती।
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"मातृभूमि, मातृसंस्कृति और मातृभाषा। यह तीन देवियां हैं, इनका सम्मान करना चाहिए। इनही से ही संसार में सम्मान मिलता है।"
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मेरा पागलपन :
उत्तराखंडी ई-पत्रिका: http://e-magazineofuttarakhand.blogspot.com/

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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #796 on: January 03, 2010, 05:25:00 PM »
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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #797 on: January 03, 2010, 05:28:04 PM »
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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #798 on: January 05, 2010, 08:02:52 AM »

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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #799 on: January 05, 2010, 08:51:02 PM »
One from my side....

An exclusive view of the Mana Village...
« Last Edit: February 11, 2010, 10:02:10 AM by Young Uttaranchal »
मैं ढूँढता तुझे था जब कुन्ज और वन में
तू ढूँढता मुझे था तब दीन के वतन में
तू आह बन किसी की मुझको पुकारता था
मैं था तुझे बुलाता था संगीत में भजन में

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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #800 on: January 10, 2010, 06:36:02 PM »


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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #801 on: January 10, 2010, 06:38:49 PM »


छोलिया नृत्य प्रस्तुत करते लोक कलाकार



जौनसारी लोकनृत्य प्रस्तुत करते कलाकार
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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #802 on: January 15, 2010, 07:31:37 PM »
Vivekji very nice pictures
मै हर दिन दोस्ती का दिन मनाना चाहता हूं.. हर दोस्त को उसका हक यानि मेरा याराना देना चाहता हूं. चाहे दूर हो पास लेकिन हर भाव के साथ उसके साथ रहना चाहता हूं....

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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #803 on: January 29, 2010, 11:06:58 AM »
Typical Mud interior of Uttarakhand house



by Navin Bhatt
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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #804 on: February 06, 2010, 10:31:28 AM »






स्वादिष्ट होने के साथ ही पौष्टिकता से भी लबरेज लोक संस्कृति में रचे-बसे ये फल बन सकते हैं आर्थिकी का जरिया

उत्तराखंड में मिलने वाले जंगली फल पौष्टिकता की खान हैं, लेकिन इन्हें अब तक महत्व नहीं मिल पाया। प्रयास यह हो कि इन्हें आगे बढ़ाया जाए। जंगली फलों की क्वालिटी डेवलप कर इनकी खेती की जाए। इसके लिए मिशन मोड में वृहद कार्ययोजना बनाकर कार्य करने की जरूरत है। इससे जहां पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत होगा, वहीं आर्थिकी भी संवरेगी। पद्मश्री डा.अनिल जोशी संस्थापक शोध संस्था हेस्को जंगली फल उपेक्षित जरूर रहे हैं, लेकिन अब इन्हें पर्याप्त महत्व दिया जाएगा। प्रथम चरण में मेलू (मेहल), तिमला, आंवला, जामुन, करौंदा, बेल समेत एक दर्जन जंगली फलों की पौध तैयार कराने का निर्णय लिया गया है। एनजीओ के जरिए यह नर्सरियों में तैयार होगी। आज नहीं तो कल इन फलों को क्रॉप का दर्जा मिलना है। फिर ये तो आर्थिकी के लिए अहम हैं। डा.बीपी नौटियाल निदेशक, उद्यान विभाग उत्तराखंड
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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #805 on: February 06, 2010, 10:46:56 AM »
vivek bhai, very nice pics, never seen such kinda. thnx for the pics & info
A good traveler has no fixed plans, and is not intent on arriving. lao tzu
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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #806 on: February 06, 2010, 12:00:17 PM »
vivek bhai, very nice pics, never seen such kinda. thnx for the pics & info


Dhanyavaad ji,  :hello2:
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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #807 on: February 06, 2010, 10:49:07 PM »
बैण्ड बाजों के सामने ढोल दमौऊं मौन है।
« Last Edit: February 11, 2010, 10:01:44 AM by Young Uttaranchal »
जैकि अपणि बोली नि भाषा नि समझा वेकि ब्वै अर बुबा नि_जीवानन्द श्रीयाल

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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #808 on: February 07, 2010, 12:02:52 AM »
देवतुल्य हैं ढोल दमौऊं

        पहाड़ी लोकवाद्य ढोल दमौऊं को देवतुल्य माना गया है। दुनिया का यही एकमात्र वाद्य है जिसमें देवताओं को भी अवतरित करने की शक्ति है। तांबे व पीतल से बने इस ढोल के दोनों छोर की पुड़ (मढ़ी हुई खाल) में दिन-रात के देवता सूर्य, चंद्रमा: डोर में गणेश भगवान के विराजित होने का उल्लेख पौराणिक संदर्भों में मिलता है। इसके साथ प्रयुक्त दमौऊ को काली के खप्पर के रूप में माना जाता है। इनके नाद स्वरों के वर्णन में शब्दकारों ने ढोलसागर रचा है, जिसमें ढोल-दमौऊ से गुंजित नादस्वरों व तालों को शब्दायित किया गया है। माना जाता है कि ढोल के तालस्वरों में भी भगवती सरस्वती का वास है। पहाड़ के सभी मंगल कार्यों के वक्त ढोल से ‘धुंयाळ’ उद्‍बोधित कर शुभारम्भ का आह्वान किया जाता है तो वहीं जागर, वार्ता, पंवड़ा में विविध तालों से सृष्टि उत्पति की कथा, वीरों की शौर्य कथायें और चैती के द्वारा प्रकृति के सौंदर्य को लोकजीवन में प्रवाहित किया जाता है।
जैकि अपणि बोली नि भाषा नि समझा वेकि ब्वै अर बुबा नि_जीवानन्द श्रीयाल

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Re: Awesome Uttarakhand !!
« Reply #809 on: February 07, 2010, 07:44:40 AM »
kothari ji dhanyavaad ..bahut achhi jaankari di hai aapne.... poraanik manyta bhi hai ki bhasha ki utpatti se poorv sabhi log kewal isharo se baate karte the.. panini rishi ke agrah par shiv ji ne apne damru se kuch naad/swar uttpan kiye jin swaro se panini rishi ne en varnmala tayaar ki.. fir paali or sanskrit ka janm hua....(baad me anek bhasha moolteh sankrit se hi bani)
dhol damaao se nikla naad bhi koi sadharan sangeet na ho kar ek 'maha-kavye' hota hai.. jis-se devtaao ka aahwaan kiya jata hai....
is vishaye par yadi aapke paas or jaankari ho to kripya awashye de....
देवतुल्य हैं ढोल दमौऊं

        पहाड़ी लोकवाद्य ढोल दमौऊं को देवतुल्य माना गया है। दुनिया का यही एकमात्र वाद्य है जिसमें देवताओं को भी अवतरित करने की शक्ति है। तांबे व पीतल से बने इस ढोल के दोनों छोर की पुड़ (मढ़ी हुई खाल) में दिन-रात के देवता सूर्य, चंद्रमा: डोर में गणेश भगवान के विराजित होने का उल्लेख पौराणिक संदर्भों में मिलता है। इसके साथ प्रयुक्त दमौऊ को काली के खप्पर के रूप में माना जाता है। इनके नाद स्वरों के वर्णन में शब्दकारों ने ढोलसागर रचा है, जिसमें ढोल-दमौऊ से गुंजित नादस्वरों व तालों को शब्दायित किया गया है। माना जाता है कि ढोल के तालस्वरों में भी भगवती सरस्वती का वास है। पहाड़ के सभी मंगल कार्यों के वक्त ढोल से ‘धुंयाळ’ उद्‍बोधित कर शुभारम्भ का आह्वान किया जाता है तो वहीं जागर, वार्ता, पंवड़ा में विविध तालों से सृष्टि उत्पति की कथा, वीरों की शौर्य कथायें और चैती के द्वारा प्रकृति के सौंदर्य को लोकजीवन में प्रवाहित किया जाता है।


पैली गढदेश  त्वीकु नमस्कार च
तेरी हम पर दयादृष्टि अपार च
तेरी छाया माँ हमकु बडी  मोज च
वीर पुत्रू की तेरी खडी  फौज च