जागर तो हमारी थाती है :बसंती बिष्ट
उत्तराखंड की एकमात्र जागर गायिका बसंती बिष्ट का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। अपनी गायिकी से देश विदेश में जागर को समृद्ध कर चुकी हैं। पिछले दिनों जब टीवी पत्रकार जगमोहन आजाद गढ़वाल में थे तो उन्हें बसंती बिष्ट से मिलने को सौभाग्य प्राप्त हुआ। बसंती बिष्ट ने तब उनके गायन से लेकर मौजूदा माहौल तक विस्तार से बातचीत की। उसी बातचीत के कुछ अंश :-
बसंती जी, कब से गा रही हैं आप जागर ?
बचपन से ही, मां अक्सर गाती थी। उनके आज भी याद है राजा जात यात्रा, नंदा देवी यात्रा के दौरान गाने वाला गाना (यह गीत पिंडर घाटी में गायी जाती है)। जब मैं मां को जागर गाते सुनती थी, तो मेरे मन में अजीब सी चुलबुलाहट होती थी। ऐसा लगता था मानो जागर मेरे कंठ में कहीं छुपे हैं। मुझे लगता था मुझे इसे बाहर लाना चाहिए और जब मैं जागर गाती थी तो ऐसा लगता था मानों साक्षात् देवता-गण मेरे सम्मुख बैठे हैं, नृत्य कर रहे हैं। मैं निहाल हो उठती थी।
पिंडर घाटी की बात आपने सुनी हैं। स्थानीय लोगों ने वहां की लोक-संस्कृति को संजोकर रखा है। आप भी वहीं से हैं, कुछ विस्तार से बताइये ?
बिलकुल सही। मैं भी चाहती हूं कि नयी पीढ़ि अपनी सभ्यता-संस्कृति के बारे में विस्तार से जाने। लोग जानें कि आखिर जागर है क्या। आपने पिंडर घाटी की चर्चा की, पिंडर घाटी की संस्कृति-सभ्यता को गढ़वालियों ने हमेशा ही नकारा है जबकि मैं गर्व से कहना चाहती हूं कि इसी घाटी से पूरे उत्तराखंड में लोक-संस्कृति की विकास यात्रा शुरू हुई। आपको पुरानी बात बताती हूं। उन दिनों हमारे गांव में एक छप्पर के नीचे स्कूल चलता था। हम चार बहनें हैं। हम लोगों को घर का सारा काम करना पड़ता था। पढ़ाई के साथ-साथ घर का काम। इसी तरह पांचवीं तक पढ़ाई की। तब हमें वजीफा भी मिलता था। इसलिए पढ़ाई खूब करते थे, लेकिन पंद्रह साल की उम्र में मेरी शादी हो गई, तब लड़कियों की शादी जल्दी हो जाती थी। लेकिन शादी से पहले में जागर के बारे में बहुत कुछ सीख चुकी थी।
मसलन –
मुझे कई गाथाएं कंठस्थ याद थीं। मां के साथ गाते-गाते कई जागर याद कर लिये थे। यहां तक कि डौंर-थाली और ढोल-दमाऊ बजाना सीख लिया था। सच कहूं, जागर गाने से मुझे जितनी खुशी होती है, मैं उसे बयान नहीं कर सकती। हमारी पिंडर घाटी में ऐसी-ऐसी लोक गाथाएं मौजूद हैं जिनके बारे में कोई नहीं जानता है। मैंने देखा है दूर-दूर से लोग आकर इन गाथाओं को सुनते थे, इन लोक-गाथाओं को अपने साथ लेकर जाते थे। लेकिन यह घाटी का दुर्भाग्य है कि इसके बावजूद किसी ने इनके संरक्षण के बारे में नहीं सोचा, किसी ने यह चुनौती स्वीकार नहीं की।
लड़की होते हुए भी आपने जागर की परंपरा को जीवित रखने की कोशिश की, सफल भी रहीं, आपके सामने भी तो कई चुनौतियां रही होंगी ?
निश्चित तौर पर, लोगों ने मेरे माता-पिता से कहा कि क्यों लड़की को बर्बाद कर रहे हैं। तरह-तरह की बातें सामने आने लगीं। लेकिन पिताजी ने मुझे पूरा सहयोग किया, प्रोत्साहित करते रहे, बताते रहे कि किन-किन गाथाओं को गाना चाहिए, कौन-कौन सी ताल हैं जिनका प्रयोग किया जाना चाहिए और कौन-कौन सी ताल पर देवता प्रकट होते हैं। शादी हुई, पति श्री रणजीत सिंह जी फौज में थे। इस शैली को बढ़ाने में उन्होंने ने भी उत्साह बढ़ाया। गांव से बाहर आने के बाद भी मैं इस क्षेत्र से लगातार जुड़ी रही। बाद में मैंने शास्त्रीय संगीत(गायन) ‘ प्राचीन कला केंद्र, चंडीगढ़ ’ से संगीत की शिक्षा ली। आकाशवाणी और दूरदर्शन के साथ-साथ मैंने देश-विदेश में जागर गाये। अब लोग सुनते हैं तो तारीफ करते हैं, एक समय था जब लोग कहते थे – लड़की को गवैय्या बना दिया। लेकिन मुझे लोकगाथाओं में रमना था, मैं रम गई।
कौन-कौन से प्रमुख जागर हैं जिन्हें गाना पसंद है?
जागर तो सभी गा लेती हूं, लेकिन नंदा जी का संपूर्ण इतिहास, मैना जी नंदा जी की मां और गुरौलाजी के गीत, आछरी, गौलू नर्सिंग और जो भी हमारे स्थानीय जागर हैं, उन्हें गाती हूं। इसके लिए वाद्य यंत्र भी खुद ही बजाती हूं। कोई दूसरा मेरे गानों के साथ वाद्य बजाता है, तो मैं ताल नहीं मिला पाती जो हमारे जागरों की मूल ताल है। जहां ताल और जागर का मेल नहीं होता, वहां मैं सिर्फ गाकर ही लोगों को सुना देती हूं।
आज के दौर में जागर शैली को कितना प्रासंगिक मानती हैं?
दौर कोई सा भी, लोक शैली या गाथाएं ऐसी हैं कि आपको उन पर विश्वास करना ही होगा। आप चाहे जितना मॉडर्न हो जायें, यह हमारे परिवेश में, जन-जीवन में किसी-न-किसी रूप में जीवित हैं। मैं जब मंच पर जाती हूं, गाती हूं, तो लोग गौर से सुनते हैं, इसका क्या मतलब हुआ। हां, बदलते वक्त के साथ यह, जागर गायन थोड़ा क्लासिकल हो गया है।
क्लासिकल से आपका मतलब?
आज जिसे री-मिक्स कहते हैं। लोगों ने इसकी लय-ताल बदल दी है। जागर मूल रूप में वही गाते हैं जो पहाड़ों में रहते हैं। मैं इस बात का विशेष ध्यान रखती हूं कि जागर की भाषा मेरी है, बोली मेरी है, उसमें कोई गाने वाला नहीं है। इसलिए जब मैं गाती हूं तो इस बात का भी खयाल रखती हूं कि वाद्य खुद बजाऊं।
तो आज के परिवेश से कैसे बिठाती हैं तालमेल?
यह सवाल कई बार खुद मेरे सामने खड़ा होता है। ऐसे में एक ही ऊपाय मुझे सूझता है। जब कोई मुझे गायन के लिए बुलाता है तो मैं साफ-साफ कह देती हूं, कि वाद्य खुद ही बजाऊंगी। तब मेरी वेश-भूषा भी वैसी ही होती है। एक घटना आपको बताना चाहूंगी। बात सन् 1995-96 की है। अखिल गढ़वाल सबा के अध्यक्ष स्व. श्री वीर ठाकुर जी ने मेरे लिए सास तौर पर कार्यक्रम आयोजित किया था। जब मैं अपनी वेश-भूषा में गाने पहुंची और जागर गाना शुरू किया तो वहां मौजूद तमाम श्रोता झूम उठे। तब मुझे लगा कि वास्ताव में अपने पहनावे और इस जागर शैली का कितना महत्व है। लेकिन, फिर भी वह चीज सामने नहीं आ पा रही है, जो मूल है।
यानी जो लोग आजकल जागर गा रहे हैं, उनमें कामियां हैं?
ठीक कह रहे हैं आप। बहुत कमियां हैं। कुछ लोगों के चलते इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आज जब लोग जागर कराते हैं, तो उसमें ऐसा कुछ भी नहीं होता, जो हमारे लोक से जुड़ा हुआ हो। जब हमारे समय पूजा होती थी, तो सबसे पहले देवता को न्योता जाता था। पुजारी लोग कई दिनों तक भक्ति करते थे, साधना करते थे। पूरे गांव में देवता की डोली घूमती थी, पेड़-पौधे, फसल-औजारों की पूजा होती थी। लेकिन अब लोग पहले शराब ढूंढ़ते हैं, फिर पूजा में बैठते हैं। इससे पूजा सफल होगी, मुझे ऐसा नहीं लगता। आज कुछ लोगों ने तो जागर का मतलब ही बदल दिया है। जागर को री-मिक्स बना दिया है। यह दुखद है कि कुछ लोग जागर के पुराने जानकारों के जागरों को अपने नाम से लिखने लगे हैं, गाने लगे हैं। कहने का मतलब, पहले पुरखों की इस थाति को संरक्षित करो, और अगर संरक्षित नहीं कर सकते तो कम-से-कम उसका मजाक मत उड़ाओ।
संरक्षण की बात की आपने, इस अनमोल धरोहर को कैसे बचाया जा सकता हैं ?
जागर हो, छोलीया, झुमैलो, चौफले हो या फिर ऋतु गीत, सबसे भयंकर परिवर्तन आये हैं। इनका मूल स्वरूप अब धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। हमारी परंपराएं खत्म हो रही हैं। शुद्ध और सरल चीजों को दूषित किया जा रहा है। इसलिए संरक्षण जरूरी है। मैंने इस मामले में कभी समझौता नहीं किया। जहां भी गाती हूं, मूल जागर ही जाती हूं, पुराने वेश-भूषे के साथ। अगर मैं अपनी शैली छोड़ दूंगी, तो वह जागर नहीं रह जायेगी, गीत बन जाएगा और मैं इसके मूल स्वरूप को नहीं बदलना चाहती हूं। ऐसा सभी को करना चाहिए।
बसंती जी, आप बार-बार मूल रूप की बात कर रही हैं, आखिर इस जागर शैली का मूल रूप था क्या ?
मैं मूल स्वरूप या रूप पर बार-बार इसलिए जोर दे रही हूं कि आज इस शैली में जो भी बदलाव किये जा रहे हैं, वह कम-से-कम जागर तो नहीं है। गीत है। इनकी शैली अलग है, तथ्य अलग हैं, गाने का तरीका अलग है, घटनाएं अलग हैं, तो फिर यह जागर कैसे हुआ। सिर्फ आधुनिक वाद्य यंत्रों पर डौंर-थाली और ढोल-दमाऊ बजाने से कोई जागर नहीं बन जाता है। असली तो वह होता है जो ताल-लाय-छंद के बारे में जानता हो, जिसे मालूम हो कि डौर-थाली-ढोल-दमाऊ की ताल पर कैसे देवताओं को प्रकट किया जाता है। जब वह गाता है, तो उसके आसपास देवताओं का वास होता है। मैं भी जब जागर गाती हूं तो मुझे भी लगता है जैसे मेरे पास जो लोग जागर सुन रहे हैं, वह सब देवता बैठे हैं, मुझे उनसे अनोखी ऊर्जा मिलती है, मैं देवलोक में खो जाती हूं। मेरे लिए यह सिर्फ जागर नहीं, यह तो हमारी थाती है, थाती, जिसके बिना मैं एक पल रह नहीं सकती।