AuthorTopic: गैरसैंण राजधानी के लिए : लड़ै जारी राली  (Read 2206 times)

Offline राजू भट्ट

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  • लात भुलेंद पर बात नि भुलेंद
कोठारी जी इस सन्दर्भ में केवल विषय-वस्तु महत्वपूर्ण है क्रियान्वन में कोई बड़ी समस्या नहीं आये गी|

भट्ट जी आपका सुझाव काबिले तारिफ है। निश्चित ही मैं जानकारों से इस विषय पर चर्चा करुंगा। आप भी फिल्म से जुड़े किन्हीं जानकारों से चर्चा कीजिएगा।

पैली गढदेश  त्वीकु नमस्कार च
तेरी हम पर दयादृष्टि अपार च
तेरी छाया माँ हमकु बडी  मोज च
वीर पुत्रू की तेरी खडी  फौज च

Offline धनेश कोठारी

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देहरादून/ विधानसभा के पटल पर राजधानी चयन आयोग की रिपोर्ट काफी पहले रखी जा चुकी है। इस पर चरचा होनी है।यह कब होगी, पता नहीं। चालू सत्र में जो स्थिति बन रही है, उसे देखते हुए तो साफ कहा जा सकता है। राजधानी का मसला इस बार भी नहीं उठ पायेगा। राजनीतिक दलों का रुझान भी कुछ कम ही नजर आ रहा है। घपले-घोटाले के आरोप-प्रत्यारोप से उपजी स्थिति के बीच यूकेडी की आवाज दबी हुई है।
      दीक्षित आयोग की रिपोर्ट स्थायी राजधानी के लिए गैरसैंण के पक्ष में नहीं है। सदन के पटल पर रिपोर्ट रखने के बाद इसका खुलासा हो चुका है। यूकेडी गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की लगातार मांग कर रही है। मगर बीजेपी-कांग्रेस समेत अन्य दलों का नजरिया बहुत स्पष्ट नहीं है। ऐसे में फिलहाल यह मसला ठंडे बस्ते में ही नजर आ रहा है।
      सरकार में साझीदार यूकेडी के एजेंडे में गैरसैंण का मसला सबसे ऊपर जरुर है। लेकिन, वह भी अपनी बात पुरजोर ढंग से नहीं रख पा रही है। दल हर विधानसभा सत्र में रैली निकालकर अपनी मंशा जरूर जता रही है।

राय-
राजधानी का मसला सभी दलों की बैठक से हल होना है। बीजेपी अलग से अपनी कोई राय व्यक्त नहीं कर सकती - बिशन सिंह चुफाल (प्रदेश अध्यक्ष बीजेपी)
पहले सरकार राजधानी मसले पर अपनी राय प्रकट करे। कांग्रेस भी अपनी राय रखने में फिर देर नहीं करेगी - यशपाल आर्य (प्रदेश अध्यक्ष कांग्रेस)
 केवल यूकेडी राजधानी मसले पर साफ है। गैरसैंण ही राजधानी होनी चाहिए। इसके लिए आखिरी दम तक लड़ेंगे - (प्रदेश अध्यक्ष यूकेडी)
Source : Amara ujala - 15/02/2010
जैकि अपणि बोली नि भाषा नि समझा वेकि ब्वै अर बुबा नि_जीवानन्द श्रीयाल

Offline सन्दीप काला

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उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी गैरसैंण घोषित करने की मांग

उत्तराखण्ड क्रांति दल (युवा प्रकोष्ठ) के जिला इकाई की यहां हुई बैठक में उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी गैरसैंण घोषित किए जाने पर जोर दिया गया।

उक्रांद के जिला कार्यालय में हुई बैठक में वक्ताओं ने बढ़ती महंगाई के लिए केन्द्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। वक्ताओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्यान्न व मिट्टी के तेल की अनुपलब्धता पर नाराजगी जाहिर की। शीघ्र ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्यान्न व मिट्टी का तेल उपलब्ध कराने की मांग की। जिलाध्यक्ष बहादुर सिंह कनवाल ने कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि वह दल की नीतियों को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाएं। वक्ताओं ने उत्तराखण्ड विधानसभा द्वारा प्रस्तुत बजट को अल्मोड़ा जनपद के लिए निराशाजनक बताया। बैठक में दल को और सुदृढ़ बनाने का निर्णय भी लिया गया।

बैठक की अध्यक्षता जिलाध्यक्ष बहादुर सिंह कनवाल व संचालन ब्लाक अध्यक्ष सोनू कनवाल ने किया।

[Source : याहू! जागरण]

जय बद्री, केदारनाथ , गंगोत्री जय जय, यमनोत्री जय जय ।

Offline धनेश कोठारी

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समर कैपिटल बने गैरसैंण

देहरादून/ गढ़वाल सांसद सतपाल महाराज ने लोकसभा में गैरसैंण को उत्तराखण्ड का समर कैपिटल बनाने की पैरवी की है। महाराज ने इसके लिए हिमांचल और जम्मू काश्मीर का उदाहरण सामने रखा। उन्होंने कहा कि गैरसैंण को समर कैपिटल बनाने से दोनों स्थानों का विकास हो सकेगा। सदन के पटल पर लिखित भाषण रखते हुए महाराज ने बताया कि उत्तराखण्ड का गठन पर्वतीय राज्य की अवधारणा पर हुआ है। ऐसे में राज्य की राजधानी भी पर्वतीय क्षेत्र में होनी चाहिए। गैरसैंण उत्तराखण्ड के मध्य में स्थित है। इस कारण इसे राजधानी बनाना सबको रास आएगा। गैरसैंण के पक्ष में जनभावना भी है। महाराज के मुताबिक राजधानी का निर्माण करने के लिए केन्द्र को उत्तराखण्ड की मदद करनी चाहिए। अल्मोड़ा सांसद प्रदीप टम्टा भी गाहे बगाहे गैरसैंण की मांग करते रहे हैं। लेकिन, राज्य में स्थिति इसके उलट है। सदन के पटल पर रखे जाने के बाद भी दीक्षित आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा तक नहीं हो पायी है। प्रदेश कांग्रेस भी अधिकारिक रूप से राजधानी मुद्‍दे पर तस्वीर साफ नहीं कर पाई है।

साभार - अमर उजाला, 21 अप्रैल 2010
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Offline विक्की राजधानी गैरसैंण

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राजधानी गैरसैण ही बनेगी और बननी चाहिए! आप लोगो को याद होगा! जब राज्य आदोलन चल रहा था! तभी राजधानी गैरसैण का प्रस्ताव गया था! और जहाँ पे विधानसभा ने बनना है उस स्थान का नाम वीर चन्द्र सिंह नगर की घोसणा हुई थी!

और आप लोगो को भलीभांति याद होगा की जब अलग राज्य बना था और राजधानी देहरादून रखी गई तो देहरादून अस्थाई राजधानी की घोसणा हुई थी न की स्थाई!

अगर राजधानी गैरसैण नहीं बनी तो ये हमारे आन्दोलन कारियों और शहीदों के अरमानो का घोर अपमान है!
अगर आप शुरू से इतिहास पे नजर दौडाओ तो आपको पता चल जायेगा की हमारे क्रांतिकारियों का सपना क्या था और आज सरकार उनके सपनो को कैसे कुचल रही है!

अगर पहाड़ की राजधानी पहाड़ पे हो तो हमारा राज्य भी हिमांचल की तरह विकास करेगा! हमारे नेता मैदानी छेत्र में हे रहते हैं पहाड़ों में तो ऐसे जाते है जैसे की पिकनिक पे जाते हैं! गैरसैण राजधानी से फायदा ही है न की कोई नुक्सान! हर जगह से गैरसैण के लिए अछी सड़कें जाएगी पूरा पहाड़ आपस में जुड़ेगा हाईवे जायेंगे तो निश्चित है की उस पे हमारे कई विरोजगार साथी अपना ढाबा, फल बेचकर अपना रोजगार कर सकते हैं जैसा की ऋषिकेश श्रीनगर सड़क पे हैं!

जय भारत .....................  जय उत्तराखंड

Offline विक्की राजधानी गैरसैंण

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राजधानी गैरसैण जाएगी जरुर जाएगी हर जगह से आवाज उठनी शुरू हो गई है! अब आ गया फिर एक बार वही जलवा और जोश दिखाने का जो हमने अलग राज्य की मांग को लेकर दिखाया था!

Offline धनेश कोठारी

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एक बात साफ समझनी होगी कि गैरसैंण में राजधानी तब तक नहीं जा सकती जब तक कि जन दबाव नहीं बनेगा। और जनदबाव का सबसे बड़ा माध्यम होता है वोट। पहाड़वासियों को एकजुट ऐलान करना होगा कि जो दल गैरसैण की स्थापना की प्रतिबद्धता को अपने ऐजेन्डे में शामिल करेगा और सरकार गठन के एक साल के अन्दर वहां राजधानी की स्थापना को सुनिश्चित करेगा उसे ही वोट मिलेगा। तो शायद कुछ परिणाम सामने आयें॥
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Offline SudarshaN RawaT

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ekdam sahi boli aapal or rajdhani ta gairsen he banan chenu
मैं तो हूँ ठेठ पहाड़ी

Offline धनेश कोठारी

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बिना रोयां त्‌ ब्वै बि दुद नि देंदी। स्यू घड़्याळी लगौण पड़ेली।

जाग जाग हे उत्तराखण्ड का बिधानसभा का द्‍यब्तौं.......
जाग जाग हे उत्तराखण्ड का रैबास्यों.........
जाग जाग हे उत्तराखण्ड का प्रबास्यों..........
जाग जाग हे उत्तराखण्ड का उत्तण-दण्ड ह्‍वयां द्‌यब्तौ......

राजधानी बणैल्या तुमारी जै जैकार होली
तुमारी सरकार होली
तुमारी पौबार होली
चार कू आठ, आठ कू बार होली
जाग जाग हे उत्तराखण्ड का निरास्यां खबेसूं...........
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Offline SudarshaN RawaT

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हा हा हा हा हा हा हा  लगावा जी लगावा कांसा की थाली में बजोलू
मैं तो हूँ ठेठ पहाड़ी

Offline SudarshaN RawaT

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कोठारी जी ये जागर आपल खुद लिखी छान क्या ?
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Offline SudarshaN RawaT

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[size=14pt]हा हा हा हा हा हा हा कोठारी जी आपका जागर की आखिरी लाइन पढ़ी की बहुत हंसी च आनु.......... ;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D[/color][/size]
मैं तो हूँ ठेठ पहाड़ी

Offline धनेश कोठारी

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रावत जी या जागर मेरि स्वरचित च। मौका प्वड़लु त्‌ गैरसैंण कि खातिर घंड़्याळु बि लगौण औन्द च।
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Offline rajneeshkhugsal

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Kothari Ji Namaskaar....

Mein dilli mein paida hua aur padhaee kee..aaj mein shadi shuda hun aur ek company mein naukri kar raha hun...garhwal se mera judaav shool k dinon se hai jab ham chuttiyoun mein jaya karte thay....apnee bolee aur bhashaa se prerit to huun lekin bolne mein thoodi hichak hooti hai....dialect mess up hoo jate hain...

Uttarakhand andolan ko meine apne pita, chacha aur apne gaon k bade boodhon k jariye dekha hai.....alag rajya milna hamare liye garv kee baat hai.....lekin aaj aapka note padhaa to soochaa k uttarakhand milna hamare liye ek viraasat mein milee cheez hoo gaye lekin aap jaise log aur woh log jo chootay chootay gaon se nikal kar andolan mein sammalit huye unke liye balidaan aur pride kee baat hai...

Uttarachal se uttarakhand hoo gaya aur raajdhaani Dehradun hoo gaye - woh jagah jahaan hamare pahaadi logoon kee tadaat k barabar agarwal, gupta aur bajaj hain....

Mere pahad k gaon k logon kya sara sangharsh- balidaan kaa yeh result mila k rajya mila to rajdhaani unn dhanadya sethoon ke haath laga jinka rajya aur rajya k logoon se koi lena dena nahiin.....Jo paise kamane ---- benefits acquire karne uttarakhand aye...

Gairsen hootaa to na sirf hamara pahaad develop hoootaa baltee garhwal aur kumaun kee rajdhani bhee lagtaa...na k koi aysii jagah kee jiskee bole bhasa uss rajya kee hee nahiin


Offline धनेश कोठारी

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खुगसाल जी आपके पहले पैरा के बारे गढ़वाली के महान कवि स्व. जीवानन्द श्रीयाल जी की लाइनें उद्धृत करना चाहुंगा। कि-
जैकि अपणि बोली नि भाषा नि समझा वेकि ब्वै अर बुबा नि॥

उत्तराखण्ड कतई बिरासत में नहीं मिला है। हमने अपने हकों के लिए लड़ाई लड़ी और तब इसे हासिल किया। इसीलिए आज राज्य के बद्दतर हालातों को देखते हुए पीड़ा होती है।
आपका कथन सही है कि आज राज्य में अल्पसंख्यक जमात हम पर हावी है। यहां तक कि वे हमारे नाले खालों और जमीनों को लगातार अपनी हदों में समेट रहे हैं और हम खुश होकर बेच भी रहे हैं। जोकि हमारे लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।
मगर इन्तजार है एक और वैचारिक क्रांति का। जब हम फिर "आज दो" जैसे नारों को इन पहाड़ों पर बुलन्द करेंगे।
आप भी अपने आसपास की पहाड़ी जमात का इसके लिए माइन्ड वास अवश्य करते रहिये।
« Last Edit: May 15, 2010, 12:05:12 AM by धनेश कोठारी »
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