AuthorTopic: गैरसैंण राजधानी के लिए : लड़ै जारी राली  (Read 2206 times)

Offline धनेश कोठारी

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  • मुट्ठियां भींचो मगर, मुट्ठियों में लावा भरकर, मुट्ठियों को तान दो।
इस विषय पर हर उत्तराखण्डी को वैचारिक बहस का न्यौता देना चाहता हूं। ताकि हम निष्कर्षों की तरफ ध्यानाकृष्ट कर सकें।
जैकि अपणि बोली नि भाषा नि समझा वेकि ब्वै अर बुबा नि_जीवानन्द श्रीयाल

Offline धनेश कोठारी

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   अगर आप ये सोच रहे हैं कि गैरसैंण में कुछ सरकारी कार्यालयों के खुलने से. कुछ नई सड़कें बनने से, कुछ अधिकारियों को मार जबरदस्ती गैरसैंण भेजने से, राजधानी के पक्षधर लोग चुप्पी साध लेंगे। शायद नहीं....। आज भावातिरेक में यह भी मान लेना कि उत्तराखण्ड में जनमत गैरसैंण के पक्ष में है। तो शायद यह भी अतिश्योक्ति से ज्यादा कुछ नहीं है। भाजपा ने जब राज्य की सीमायें हरिद्वार-उधमसिंहनगर तक बढ़ाई थीं तो अलग पहाड़ी राज्य का सपना तब ही बिखर गया था। और फिर परिसीमन ने तो मानो खूंन ही निचोड़ दिया। ऐसे में जानते हो कि हम (पहाड़ी) शक्तिहीन हो चुके हैं! तब भी गैरसैंण की मांग जारी है। क्यों है न आश्‍चर्य....।
   सच यह भी है कि राज्य का एक बड़ा वर्ग जो शिक्षित है और, बेहद चालाक भी.........। मगर वह समझ-बुझकर भी अनजान है कि अलग राज्य क्यों मांगा गया? वह अनजान ही बने रहना चाहता है। क्योंकि आज यदि वह नौकरीपेशा है तो उसे आरामदायी नौकरी के आसान तरीके मालूम हैं। व्यवसायी है तो, वह अपनी पार्टी को कराधान जैसे मसलों पर ‘चंदे’ का लॉलीपाप दिखाने का हुनर रखता है। राजनीतिज्ञ है तो, जानता है कि कितनी बोतलों में उसकी जीत सुनिश्चित होगी।
   कांग्रेस-भाजपा के लिए गैरसैंण में रेल, हवाई जहाज नहीं जाते। उन्हें वहां भूकम्प के कारण अपना ‘अमर’ रहने का वरदान निश्फल हो जाने का डर है। राज्य निर्माण के बाद यहां की ‘मलाई’ की पहली स्वघोषित हकदार यूकेडी आज खुरचन को भी नहीं छोड़ना चाहती है। ऐसे में एक सवाल लाजिमी उभरता है कि गैरसैंण राजधानी फिर किसको चाहिए?
   आज मुझे याद आ रहा है आन्दोलन का वह दिन जब मैं और मेरे साथी ५ दिसम्बर १९९४ को जेल भरो के तहत मुनि की रेती से नरेन्द्रनगर के लिए रवाना हुए थे। उस दिन सड़क के दोनों छोर से आम आदमी हम पर फूलों की वर्षा करते हुए ‘जेल की रोटी खायेंगे, उत्तराखण्ड बनायेंगे’ का नारा हमारे साथ बुलन्द कर रहे थे। नरेन्द्रनगर में रस्म अदायगी के बाद अधिकांश वापस लौटना चाहते थे, सिवाय हम ११ लोगों के। नरेन्द्रनगर में कई आम व दिग्गज लोगों ने जेल न जाने देने का खासा प्रयास किया। यहां तक कि, कुछ ने तो शासन-प्रशासन के उत्पीड़न का खौफ दिखाकर रोकना चाहा। सब नाकाम रहे।
   यह मैं इसलिए याद कर रहा हूं, क्योंकि आज भी बहुत से लोग हमें राज्य की आर्थिक स्थिति का डर दिखा रहे हैं। अब भी गुमराह कर रहे हैं कि, विकास की बात कीजिए। राजधानी से क्या हासिल होगा? यह कोई नहीं बता रहा कि वे किसके विकास का दम भर रहे हैं। क्या उसमें घेस-बधाण, नीती-मलारी, त्यूनी-चकरौता, धारचुला, अल्मोड़ा, बागेश्वर, रवाईं- जौनपुर, गंगी-गुंजी आदि का आखिरी आदमी शामिल है? बिलकुल भी नहीं। लेकिन उत्तराखण्ड तो इन्होंने ही मांगा था। उत्तराखण्ड की मांग हरिद्वार, उधमसिंहनगर, रुड़की, मंगलौर या अब शामिल होने की चाहत रखने वाले बिजनौर, सहारनपुर ने तो नहीं की थी।
   तमाम बहस-मुबाहिसों को दरकिनार कर एक लाइन में समझा जाना चाहिए कि, उत्तराखण्ड को ‘पहाड़ों’ ने मांगा था। पहाड़ ने खूंन बहाकर मांगा था। अपने युवाओं को बलिदान कर मांगा था। इसलिए गैरसैंण भी उन्हें ही चाहिए।
आखिर टालोगे कब तक.....?
धधकने से पहले मानो तो मान जाओ............!!

धनेश कोठारी
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Offline धनेश कोठारी

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  • मुट्ठियां भींचो मगर, मुट्ठियों में लावा भरकर, मुट्ठियों को तान दो।
श्री नरेन्द्र सिंह नेगी का गैरसैंण का पक्षधर गीत-

तुम बि सुणा मिन सुण्याली, गढ़वाळ ना कुमौ जाली
उत्तराखण्डै राजधानी, बल देरादूणि मा राली
दीक्षित आयोगन् बोल्याली
वूंन ब्वलण छौ बोल्याली, हमुन् सुण्ण छौ सुण्याली
या बि लड़ै लगीं राली, या बि लड़ै लगीं राली
लड़ै हमरी लगीं राली............,

राज से पैलि राजधानी, त्यै छै पर सरकार नि मानी
गढ़वाळ कुमौ का बीच, जनतान् गैरसैंण ठानी
ठाण्याली त ठाण्याली, या बि लड़ै लगीं राली
लड़ै हमरी लगीं राली............,

नौ बर्सूं मा स्ये कि जागी, धन्य हो पण्डाजी पैलागी
पैंसठ लाख रूप्या खर्चि कि, देरादूण अब खोज साकी
जनता का पैंसौं कि छर्वाळी, या बि लड़ै लगीं राली

गैरसैंण बल भ्यूंचळा कि डर, राजकाज बल कन्न कै हूण
सुख सुविधा कुछ बि नि छन वख, हमरु छंद त देरादूण
अफसर नेतौंन् सोच्याली, या बि लड़ै लगीं राली
लड़ै हमरी लगीं राली............,

अल्लकनन्दा पिण्डर घाटी, नित बगणीन् काणि नी
दीक्षित आयोगजी बोन्ना छन, गैरसैंण बल पाणि नी
यखै जल सम्पदा भैर जाली, या बि लड़ै लगीं राली
लड़ै हमरी लगीं राली............,

कांग्रेस भाजपा नि रैनी, कबि गैरसैंण का हक मा
सड़कूं मा बि सत्ता मा बि यूकेडी जकबक मा
सरकार कब तक बौगा सारली, या बि लड़ै लगीं राली
लड़ै हमरी लगीं राली............,
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Offline vivekpatwal

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वोट के गणित का सियासी गुणा-भाग

अतुल बरतरिया, देहरादून सात सालों की कवायद के बाद तैयार राजधानी आयोग की रिपोर्ट अब विधानसभा के हवाले है। सियासी हालात कुछ ऐसे बन रहे हैं कि सदन में इस रिपोर्ट पर चर्चा के आसार बेहद कम ही लग रहे हैं। ऐसे में सवाल यह भी खड़ा हो रहा है कि स्थायी राजधानी का मुद्दा आखिर हल कब होगा। भाजपा ने अलग राज्य तो बना दिया पर देहरादून को अस्थायी राजधानी का तमगा देकर ऐसा सवाल खड़ा कर दिया, जिसका हल आज नौ सालों बाद भी नहीं तलाशा जा सका। भाजपा की अंतरिम सरकार के समय में शुरू हुई स्थायी राजधानी की खोज आज तक पूरी नहीं हो सकी है। इस मामले में गठित दीक्षित आयोग ने सरकार की तमाम कोशिशों के बाद एक रिपोर्ट तो दी पर साफ तौर पर कुछ न कह सियासी दलों की बेचैनी को और बढ़ा दिया। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने रिपोर्ट को सदन में पेश कर मानों अपने गले से एक मरा सांप उतार फेंका है। अब इस मुद्दे पर भाजपा के पास सटीक उत्तर है कि फैसला सदन को करना है। जाहिर है कि भाजपा अपने स्तर से तो इस मुद्दे पर सदन में चर्चा कराने से रही। अब बात मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की। कांग्रेस ने भी सियासी चाल खेली और इस रिपोर्ट पर ही सवालिया निशान लगा दिए। कांग्रेस साफ कर चुकी है कि आयोग की यह रिपोर्ट अधूरी है और कांग्रेस को इस पर कोई बात ही नहीं करनी है। ऐसे में यह भी संभव नहीं है कि दीक्षित आयोग की रिपोर्ट पर सदन में चर्चा के लिए कांग्रेस की ओर से कोई पहल की जाए।सत्ता में भागीदार होने के बाद भी सरकार के खिलाफ सड़कों पर आने वाले क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल के सुर इस मामले में एकदम अलग हैं। उक्रांद को राजधानी के मामले में गैरसैंण से कम कुछ भी मंजूर नहीं है और दीक्षित आयोग ने अपनी रिपोर्ट में गैरसैंण को कोई खास तवज्जो नहीं दी है। ऐसे में उक्रांद कभी नहीं चाहेगा कि ऐसे सदन में इस रिपोर्ट पर चर्चा हो, जिसमें उसके महज तीन ही सदस्य हैं।दूसरे सबसे बड़े विपक्षी दल बहुजन समाज पार्टी भी इस मुद्दे पर अपने पत्ते खोलने को तैयार ही नहीं है। बसपा ने साफ कर दिया है कि रिपोर्ट पर सदन में चर्चा होने पर ही देखा जाएगा कि इस मामले में पार्टी का क्या रुख रहे। ऐसे में बसपा की ओर से चर्चा की मांग आना भी संभव नहीं दिख रहा है। बहरहाल, हर सियासी दल के पास वोटों का अपना गणित है और इसके हल का कोई भी गुणा-भाग फायदा पहुंचाता नहीं दिख रहा है। ऐसे में सियासी दल मौन रहने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं।
Vivek Patwal
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Offline m_a_n_u

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Bahut khub.....kothari ji ..share karne ke liye... :hello2:

श्री नरेन्द्र सिंह नेगी का गैरसैंण का पक्षधर गीत-

तुम बि सुणा मिन सुण्याली, गढ़वाळ ना कुमौ जाली
उत्तराखण्डै राजधानी, बल देरादूणि मा राली
दीक्षित आयोगन् बोल्याली
वूंन ब्वलण छौ बोल्याली, हमुन् सुण्ण छौ सुण्याली
या बि लड़ै लगीं राली, या बि लड़ै लगीं राली
लड़ै हमरी लगीं राली............,

राज से पैलि राजधानी, त्यै छै पर सरकार नि मानी
गढ़वाळ कुमौ का बीच, जनतान् गैरसैंण ठानी
ठाण्याली त ठाण्याली, या बि लड़ै लगीं राली
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नौ बर्सूं मा स्ये कि जागी, धन्य हो पण्डाजी पैलागी
पैंसठ लाख रूप्या खर्चि कि, देरादूण अब खोज साकी
जनता का पैंसौं कि छर्वाळी, या बि लड़ै लगीं राली

गैरसैंण बल भ्यूंचळा कि डर, राजकाज बल कन्न कै हूण
सुख सुविधा कुछ बि नि छन वख, हमरु छंद त देरादूण
अफसर नेतौंन् सोच्याली, या बि लड़ै लगीं राली
लड़ै हमरी लगीं राली............,

अल्लकनन्दा पिण्डर घाटी, नित बगणीन् काणि नी
दीक्षित आयोगजी बोन्ना छन, गैरसैंण बल पाणि नी
यखै जल सम्पदा भैर जाली, या बि लड़ै लगीं राली
लड़ै हमरी लगीं राली............,

कांग्रेस भाजपा नि रैनी, कबि गैरसैंण का हक मा
सड़कूं मा बि सत्ता मा बि यूकेडी जकबक मा
सरकार कब तक बौगा सारली, या बि लड़ै लगीं राली
लड़ै हमरी लगीं राली............,


सुखी दुखी जखी रोला त्वे ते नि बिसरोला, तेरो मान सम्मान तेरा गीतू गुन्जोला
देसु परदेसा रे , मेरा गढ़ देसा हे........

Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"

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  • देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूँ, उड़कर अनंत आकाश से...
भागणा पाड़ी देहरादूण,
घ्यू  की माणी देहरादूण,
रज्जा राणी देहरादूण,
उत्तराखंड देहरादूण,
नेता नि रंदु पाड़ मा,
सब्बि धाणी भाड़  मा,
सोचा सब्बि भै बन्धु,
गैरसैण कनुकै होण?
नेता छन सुनिन्द होयाँ,
कनुकै ऊँ सनै बतौण,
जग्दु मुछाळु उठावा,
डौंरी थगोलि  बजावा,
नेतौं का नौं कू तुम,
रणक्याळु घड्याळु लगावा,
बिजि जाला जब ऊ,
गैरसैण भटेक बोला,
अब नि सेवा नेता जी,
आँखा अर कंदूड़ खोला.
(रचना: "ज़िग्यांसु")
कितनी सुन्दर देव-भूमि, देखूं उड़कर आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं,जाकर बिल्कुल पास से...रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

Offline धनेश कोठारी

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  • मुट्ठियां भींचो मगर, मुट्ठियों में लावा भरकर, मुट्ठियों को तान दो।
अतुल बरतरिया के लेख से साफ है कि गैरसैंण राजधानी के सवाल पर सदन में मौजुद राजनीतिक दलों को कोई दिलचस्पी नहीं। यों भी भाजपा राज्य निर्माण के मसौदे में मैदानी हिस्सों का एक बड़ा भाग मिलाकर पहाड़ी राज्य की अवधारणा को छितरा चुकी थी। बाकी काम उसने आयोग का गठन कर पूरा किया। गैरसैंण के पक्ष में पसरी गहरी खामोशी पहाड़ के लिए चिंता का विषय है। अफसोस कि गैरसैंण अब तक वोट में तब्दील नहीं हो सका। आखिर किसको मानें जिम्मेदार ? 13 फरवरी को सरकार के मुखिया का एक कार्यक्रम में कहना था कि, हम देहरादून- हल्द्वानी में जो विकास कर रहे हैं वह पहाड़ का विकास ही हैं। शायद उनके नजरिए से देखें तो उन्होंने झूठ नहीं बोला। आखिर देहरादून, हलद्वानी में बढ़ती भीड़ इस बात की गवाह है कि हम पहाड़ को छोड़कर गैरसैंण के मायनों को भोथरा कर चुके हैं, और सरकार की रणनीतिक मंशा को भी पनाह दे चुके हैं। वहीं दूसरी तरफ हम देहरादून, हल्द्वानी आकर माफियाओं की जमीन भी मजबूत कर रहे हैं। अपनी खुली तिबारियों को छोड़कर हम 100-150 गज के ‘दड़बों’ में गर्व महसूस करने लगे हैं। उधर हमारी तिबारियों के हेरिटेज में बाहरी लोगों को पर्यटन की अपार संभावनायें नजर आ रही हैं, आंखें बंद हैं तो सिर्फ हमारी। ऐसे में राज्य की राजधानी गैरसैंण पहुंचेगी! फिलहाल जबरन आशान्वित ही हुआ जा सकता हैं।
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Offline राजू भट्ट

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  • लात भुलेंद पर बात नि भुलेंद
राज्य निर्माण के समय ही राजधानी का चयन हो जाना चाहिए था| अब तो यदि गैरसैण के बारे में सोचना है तो वही जनमत वही आन्दोलन वही उर्जा शक्ति का प्रयोग करना पड़े गा जो राज्य निर्माण के समय किया था| अस्थाई राजधानी तो केवल नाम के लिए अस्थाई होती है| हरियाणा की अस्थाई राजधानी को 50 वर्ष होने वाले है| 2 - 4 वर्षो में कोई एक आध लेख समाचार पत्रों में छप जाता है या फिर कभी कभी चुनावों में कोई घोषणा हो जाती है| इसके अतिरिक्त स्थाई राजधानी के लिए कोई ठोस कदम आज तक नहीं उठाया गया| इसलिए एक बार फिर से जन चेतना जगानी होगी| 
पैली गढदेश  त्वीकु नमस्कार च
तेरी हम पर दयादृष्टि अपार च
तेरी छाया माँ हमकु बडी  मोज च
वीर पुत्रू की तेरी खडी  फौज च

Offline धनेश कोठारी

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निश्चित ही राज्य निर्माण के समय ही राजधानी का चयन हो जाना चाहिए था। लेकिन तब भाजपा ने बेहद शातिराना ढ़ंग से राजधानी को अस्थाई घोषित कर पहाड़ी राज्य की अवधारणा को ही धूमिल कर डाला था। जबकि उत्तराखण्ड के साथ ही गठित छत्तीसगढ़, झारखण्ड के निर्माण में ऐसी कोई गुस्ताखी उसने नहीं की। उन्हें न सिर्फ तय राजधानी दी बल्कि नाम में भी हेरफेर करने की जुर्रत नहीं की। उत्तराखण्ड के निर्माण में तब पूरा ध्यान रखा गया कि इसे पहाड़ी राज्य होने न दिया जाय। इसी लिए आन्दोलनकारियों की मांगों के विपरीत राज्य की सीमायें रुड़की-मंगलौर और उधमसिंहनगर तक बढ़ा दी गई। नतीजा परिसीमन के बाद पहाड़ के लोगों के पास अब प्रतिवाद करने लायक ताकत भी नहीं बची है। उत्तराखण्ड की विडम्बना है कि यहां का वोटर राष्ट्रीय चिंताओं पर तो वोट करता है, लेकिन राज्य से जुड़े हितों को अपने सरोकारों से नहीं जोड़ता। बावजूद इसके कहूंगा कि
जागते रहो!! जागते रहो!!  जागते रहो!!  जागते रहो!! जागते रहो!! जागते रहो!! जागते रहो!! जागते रहो!! जागते रहो!! जागते रहो!!
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Offline Tribhuwan

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राजधानी के मुदे पर न ही उत्तरखंड के लोगों में कोई जोश  और चेतना दिखाई देती है ना ही राजनैतिक दलों में कोई उत्साह. मेरा मानना तो ये है की राजधानी देहरादून से हटकर कहीं पहाड़ में पर चाहिए भले ही पैसे के कामी के चलते उसे  पूरी तरह से शिफ्ट करने में २०-२५ साल या और अधिक समय लगे. गैरिसैन के लेकर मेरा reservation केवल पानी के लेकर है. पानी के कमी के चलते आज पहाड़ में जो भी शहर घाटी सी अधिक ऊंचाई में बसा है उसे भविष्य का शहर नहीं कहा जा सकता.

Offline धनेश कोठारी

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गैरसैंण ही............

पहाड़ को
सराहा जा सकता है
समतल में
संवारा नहीं जा सकता
सिर्फ
जमींदोज होकर
रह सकता है पहाड़
समतल में

मैदानों में
बोये जाने वाले पेड़
पहाड़ों पर नहीं उगते
न ही
हबों-टबों का पानी
पहाड़ों पर
पेड़ों को उगा पाता है

सुर्य पहाड़ों पर
उदित होकर
मैदानों में
अस्त हो जाता है
अन्धेरों का चांद
कितना गर्मायेगा
पहाड़ों को

गैरसैंण पहाड़ को
पहाड़ गैरसैंण को जानता है
क्योंकि
गैरसैंण
‘गैर’ होने से ज्यादा अपना है

इन्हीं ‘पहाड़ों’ ने
खूंन बहाकर मांगा था
युवाओं का बलिदान कर मांगा था
उत्तराखण्ड को
इसलिए
गैरसैंण भी उन्हें ही चाहिए

कापीराइट : धनेश कोठारी
जैकि अपणि बोली नि भाषा नि समझा वेकि ब्वै अर बुबा नि_जीवानन्द श्रीयाल

Offline राजू भट्ट

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  • लात भुलेंद पर बात नि भुलेंद
कोठारी जी आप अपनी रचनाओ के माध्यम से एक बार पुन: वही जन चेतना पैदा कर सकते है| जो संतुष्ट हो कर घर बैठ गए है उन्हें झंझोड़ सकते है| उत्तराखंड के ठेकेदारों को दर्पण दिखा सकते है| जिस दिन जन मानस में जागृती आ गयी, राजधानी स्थानांतरण को कोई राजनीती, कोई रिपोर्ट, कोई पानी, कोई भूकंप नहीं रोक पाए गा| 
ऐसा लिखो जिसे कोई अनसुना न कर पाए|
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Offline राजू भट्ट

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यदि इस विषय पर कुछ अच्छे गीत हो तो विडियो एल्बम के बारे में सोचा जा सकता है| या फिर एक फिल्म जिसका नाम ही हो गैरसैण|
पैली गढदेश  त्वीकु नमस्कार च
तेरी हम पर दयादृष्टि अपार च
तेरी छाया माँ हमकु बडी  मोज च
वीर पुत्रू की तेरी खडी  फौज च

Offline धनेश कोठारी

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भट्ट जी आपका सुझाव काबिले तारिफ है। निश्चित ही मैं जानकारों से इस विषय पर चर्चा करुंगा। आप भी फिल्म से जुड़े किन्हीं जानकारों से चर्चा कीजिएगा।
जैकि अपणि बोली नि भाषा नि समझा वेकि ब्वै अर बुबा नि_जीवानन्द श्रीयाल

Offline धनेश कोठारी

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जिन्हें गैरसैंण में भूकम्प (आपदा) का डर है, उनके लिए-

तुम्हारी मौत का मातम हम मनायेंगे
हमें जिन्दगी के चार दिन तो जीने दो

यहां नमी है बहुत धुंध ने रोकी है किरण
मेरे हिस्से की धूप तो मुझ तक आने दो

ढलानों से बहती चली जा रही है मिट्टी
बादलों को इस दौर में ही पूरा निथरने दो

यों बेहद थका देती हैं ये तीखी उकाळ-उंदार
हौसलों को आज भी पस्त हिम्मतों से भिड़ने दो

मुक्कमल यों तो जिन्दगी भी नहीं होती है
चाहो तो खंडहरों को फिर से संवरने दो

इन अंधेरों में आंखें नहीं देख पाती हैं ‘धनेश’
उजालों की चौंध से आंखों का जाला तो फटने दो॥

Copyright@ Dhanesh Kothari
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